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Janmashtami 2022: श्रीकृष्ण की वो पांच बातें, जिन्हें अपनाकर जीवन में मिल सकती है सफलता

लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवानी अवस्थी Updated Thu, 18 Aug 2022 12:19 AM IST
कृष्ण के जीवन से लें सफलता के मंत्र
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Janmashtami 2022: पुराणों और शास्त्रों के मुताबिक, भगवान श्रीकृष्ण विष्णु जी का अवतार हैं। विष्णु जी ने माता देवकी और वासुदेव जी के वंश में कान्हा के रूप में जन्म लिया था। पृथ्वी को पाप से मुक्ति दिलाने के लिए कन्हैया पृथ्वी पर अवतरित हुए थे। उनका पूरा जीवन मानव जाति के लिए सीख था। बचपन में गोकुल और वृंदावन में अपने नटखट रवैए और शैतानियों से उन्हें खेल खेल में लोगों को सही और गलत में सिखाया। गांव की महिलाएं और लड़कियां जो यमुना में स्नान करने जाती, उनके कपड़े चुराकर कान्हा ने एक बड़ा संदेश दिया। राधा से प्रेम किया लेकिन विवाह नहीं किया, इसके जरिए भी उन्होंने धर्म और कर्म के बारे में सिखाया। महाभारत में अर्जुन का सारथी बन पाप औ असत्य के खिलाफ युद्ध के लिए अपनों के विरुद्ध खड़े होने का पाठ पढ़ाया।  धर्म विशेषज्ञों के मुताबिक, श्रीकृष्ण के बताए मार्ग पर चलकर जीवन की कठिनाइयों को दूर कर सकते हैं। उनके जीवन की कुछ बातों को अपनाकर कोई भी अपनी जिंदगी में सफलता पा सकता है। 18/19 अगस्त को कृष्ण जन्माष्टमी है। इस दिन कन्हैया का जन्म हुआ था। कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर देवकीनंदन की वो पांच बातें जानें, जिन्हें अपनाकर जीवन में सफलता हासिल कर सकते हैं।

द्रौपदी
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मुश्किल वक्त में दें साथ

सुदामा एक गरीब ब्राह्मण थे और कृष्ण द्वारिकाधीश थे यानी एक राजा बन चुके थे। लेकिन जब सुदामा को मदद की जरूरत थी, तो कृष्ण ने उनका साथ दिया। जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था, भगवान श्रीकृष्ण उनकी मदद के लिए आगे आए। जब पांडव और कौरवों का मुकाबला हुआ तब भले ही कौरवों के पास ज्यादा सेना, बड़े बड़े धुरंधर थे लेकिन कृष्ण ने अपने मित्रों यानी पांडवों का साथ दिया। जब भी किसी को कृष्ण की मदद की जरूरत पड़ी, तो कान्हा हमेशा उनकी मदद के लिए आगे आए।
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श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की कहानी
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दोस्ती में हैसियत न देखें

कृष्ण और सुदामा की मित्रता की मिसाल दी जाती है। एक राजा और एक गरीब बचपन में शिक्षा के दौरान आश्रम में मिले। सालों बाद परिस्थितियां बदलीं। सुदामा की आर्थिक हालात बहुत बिगड़ गई। लेकिन केशव को सुदामा के गरीब होने या भिक्षा मांग कर परिवार का भरण पोषण करने पर कोई शर्मिंदगी नहीं थी। उनके लिए सुदामा बाल सखा थे। सुख दुख के साथी थे। एक राजा होते हुए भी उन्होंने सुदामा के महल आने पर उनका बहुत अच्छे से आदर सत्कार किया। खुद सुदामा के चरणों को धोया। मित्रता में कन्हैया ने कभी हैसियत नहीं देखी।
महाभारत
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सही राह पर चलने की सलाह

श्रीकृष्ण खुद धर्म के मार्ग पर चले और अन्य लोगों को भी सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। धर्म की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने कौरवों की सेना का सामना करने के लिए पांडवों को प्रेरित किया। जब युद्ध मैदान में अर्जुन के सामने उनके परिवार के लोग खड़े थे, जिनसे युद्ध करने के नाम से अर्जुन व्याकुल हो गए तो कृष्ण ने अर्जुन को गीता का पाठ सुनाया। सारथी बनकर पूरे युद्ध में अर्जुन के साथ चलते रहें और धर्म की लड़ाई में पांडवों का साथ दिया।
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कृष्ण से सीखें जीवन की सफलता का मत्र
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शांति का पाठ

भले ही महाभारत के युद्ध में श्रीकृष्ण ने अर्जुन का सारथी बन उनकी सहायता की। भले ही कृष्ण ने गीता का उपदेश देकर अर्जुन को अपने ही रिश्तेदारों से युद्ध करने के लिए प्रेरित किया लेकिन जब इस युद्ध का आगाज होने वाला था, तो कन्हैया ने महाभारत रोकने का प्रयत्न भी किया था। वह स्वयं कौरवों के पास पांडवों का शांतिदूत बनकर गए थे। वह चाहते थे कि यह विवाद शांति से निपटाया जाए, हालांकि कौरवों ने उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया और महाभारत का युद्ध फिर भी हुआ।
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