तेलंगाना पर कल, आज और कल

नई दिल्ली Updated Mon, 28 Jan 2013 08:50 PM IST
telangana history, present and future
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तेलंगाना को पृथक राज्य का दर्जा देने के मुद्दे पर एक बार फिर केंद्र सरकार ने टालमटोल वाला रवैया अपनाया है, जिससे इस क्षेत्र में तनाव बढ़ना स्वाभाविक है। हैरत की बात है कि अपने साढ़े आठ साल के शासन में कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार इस मुद्दे पर कोई राय नहीं बना सकी है।
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वर्ष 2004 के चुनाव में उसने तेलंगाना राष्ट्रीय समिति के नेता के चंद्रेशखर राव से समझौता ही इसी आधार पर किया था कि वह सत्ता में आने के बाद राज्य पुनर्गठन आयोग बनाएगी, मगर इतने वर्षों के बाद भी ऐसा लगता है कि यह मुद्दा जहां का तहां पड़ा है और सरकार अपनी घोषणाओं से ही पीछे हटती जा रही है। पिछले महीने सर्वदलीय बैठक में गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने घोषणा की थी कि 28 जनवरी तक इस मसले पर सरकार कोई न कोई फैसला ले लेगी, पर अब सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि उसे और वक्त चाहिए।


एक समय तो तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम ने नए राज्य के गठन का ऐलान ही कर दिया था, मगर उसके बाद न्यायमूर्ति बीएन कृष्ण की अगुआई में आयोग गठित कर लीपापोती करने की कोशिश की गई। आश्चर्य है कि सरकार की ओर से एक बार फिर दार्जिलिंग की तरह तेलंगाना क्षेत्रीय स्वायत्त परिषद के गठन का सुझाव आ रहा है, जबकि इस सुझाव को टीआरएस ही नहीं, खुद कांग्रेस के उस क्षेत्र के सांसद-विधायक खारिज कर चुके हैं।

कांग्रेस की दुविधा यह है कि लोकसभा और विधानसभा के चुनावों को डेढ़ वर्ष भी नहीं बचे हैं, ऐसे में तेलंगाना पर कोई भी फैसला उसके लिए दुधारी तलवार की तरह है। यदि तेलंगाना अलग राज्य बन जाता है, तो उसे जगनमोहन रेड्डी के प्रभाव और 25 लोकसभा सीटों वाले रायलसीमा और तटीय इलाकों में नुकसान हो सकता है और यदि अलग राज्य नहीं बनता है, तो 17 लोकसभा सीटों वाला तेलंगाना उसके हाथ से निकल सकता है।

कहने की जरूरत नहीं कि सरकार ने इस मामले में शुरू से ही अदूरदर्शिता दिखाई है। अब यदि वह राज्य गठन का ऐलान करती है, तो विदर्भ और पूर्वांचल जैसे क्षेत्रों से भी ऐसी मांगें जोर पकड़ सकती हैं। अच्छा तो यह होगा कि वह बिना देर किए राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना करे, ताकि ऐसी सभी मांगों पर गौर किया जा सके।

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