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...तो क्या 20 साल के बाद हमें खाने पड़ेंगे कीड़े-मकोड़े

लंदन/इंटरनेट डेस्क Updated Wed, 01 Aug 2012 12:00 PM IST
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बढ़ती महंगाई और जनसंख्या को देखते हुए जानकार इस बारे में सोचने लगे हैं कि भविष्य में हमारा खाना क्या होगा, अब से 20 साल बाद हम कैसा खाना परोस रहे होंगे? खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों, बढ़ती आबादी और उन्हें लेकर पर्यावरणविदों की चिंताओं ने भविष्य में भोजन को लेकर संयुक्त राष्ट्र के साथ-साथ सरकारों की परेशानी भी बढ़ा दी है। अनुमान है कि अकेले ब्रिटेन में अगले पांच से सात वर्षों में गोश्त के दाम दोगुने हो सकते हैं जिससे वो आम लोगों की पहुंच से बाहर हो सकता है।
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भविष्य में भोजन के स्वरूप पर काम करने वाली मोर्गन गाए का कहना है, 'खाद्य पदार्थों के बढ़ते दामों की वजह से हम उस दौर की वापसी देख रहे हैं जब गोश्त समृद्धि से जुड़ जाएगा। इसका मतलब है कि हमें गोश्त के कारण पैदा होने वाली खाई को पाटने के तरीके तलाशने होंगे।'

बर्गर में होंगे कीड़े-मकोड़े
गाए का कहना है कि हमारे खाने में कीड़े-मकोड़ों की अहम जगह हो सकती है। दरअसल नीदरलैंड्स के वागेनिनगेन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अनुसार कीड़े मकोड़ों में भी आम गोश्त के जितने पोषक तत्व पाए जाते हैं, जबकि उन पर मवेशियों की तुलना में कम लागत आती है।

कीड़े-मकोड़ों की 1400 ऐसी प्रजातियां हैं जिन्हें इंसान खा सकता है। दुनिया के कई हिस्सों में की़ड़े मकोड़े खाए जाते हैं। अफ्रीका में कैटरपिलर और टिड्डी, जापान में ततैंयों और थाईलैंड में कीट पतंगें बड़े चाव से खाए जाते हैं।

गाए यह नहीं कह रही हैं कि जल्द की आपकी तश्तरी में समूचे कीड़े मकोड़े परोसे जाने लगेंगे, बल्कि वह मानती हैं कि बर्गर और सॉसेज में कीड़े इस तरह इस्तेमाल हो सकते हैं कि वो आपको समूचे दिखाई न दें।

प्रयोगशाला में बने गोश्त
इसी साल डच वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में गोश्त विकसित करने में भी कामयाबी हासिल कर ली। उन्होंने गाय की मूल कोशिकाएं लेकर ये कारनामा किया। वे इस साल के अंत तक दुनिया का पहला 'टेस्ट ट्यूब बर्गर' भी तैयार करने का दावा कर रहे हैं।

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में हुए हालिया अध्ययन के अनुसार मवेशियों को मारने से बेहतर होगा कि गोश्त प्रयोगशाला में ही तैयार किया जाए, क्योंकि इससे ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम होगा और ऊर्जा व पानी की खपत भी घटेगी। हालांकि इसे लोगों में लोकप्रिय बनाने के लिए बहुत ज्यादा काम करना होगा क्योंकि अभी ऐसी कोई चीज चलन में नहीं है.

शैवाल हो सकता है अच्छा विकल्प
शोधकर्ताओं का कहना है कि शैवाल इंसानों और पशुओं के लिए खाना मुहैया करा सकते हैं और उन्हें सागर में उगाया जा सकता है। बहुत से वैज्ञानिकों की तो ये भी राय है कि शैवाल से मिलने वाले जैव ईंधन से भूमिगत ईंधन की जरूरत को कम करने में भी मदद मिल सकती है।

कई जानकार मानते हैं कि शैवाल की खेती दुनिया का सबसे बड़ा फसल उद्योग बन सकता है। किसी जमाने में एशिया और खास कर जापान जैसे देशों में इसके बड़े फार्म पाए जाते थे। दुनिया में 10 हजार प्रकार के समंदरी पौधे पाए जाते हैं, जो दुनिया में खाने की समस्या को हल करने में मददगार साबित हो सकते हैं।

ब्रिटेन के शेफील्ड हमल विश्वविद्यालय में वैज्ञानिकों ने समंदर में होने वाले पौधों के चूर्ण को ब्रेड और प्रोसेस्ड फू़ड में नमक की जगह इस्तेमाल किया। इस चूर्ण का स्वाद खासा मजबूत होता है लेकिन उसमें नमक कम पाया जाता है, जबकि नमक उच्च रक्तचाप, पक्षाघात और समय से पहले होने वाली मौतों के लिए जिम्मेदार माना जाता है।

साभार बीबीसी

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