सोमनाथ ज्योर्तिलिंग

राकेश Updated Mon, 16 Jul 2012 12:00 PM IST
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यह ज्योतिर्लिंग सोमनाथ नामक विश्वप्रसिद्ध मंदिर में स्थापित है। यह मंदिर गुजरात प्रांत के काठियावाड़ क्षेत्र में समुद्र के किनारे स्थित है। पहले यह क्षेत्र प्रभासक्षेत्र के नाम से जाना जाता था। यहीं भगवान श्रीकृष्ण ने जरा नामक व्याधके बाण को निमित्त बनाकर अपनी लीला का संवरण किया था। पुराणों में इस ज्योतिर्लिंग की कथा कुछ इस प्रकार है। दक्ष प्रजापति की सत्ताइस कन्याएं थीं। उन सभी का विवाह चंद्र देवता के साथ हुआ था। किंतु चंद्रमा का समस्त अनुराग उनमें से केवल एक रोहिणी के प्रति ही रहता था। उन्होंने अपनी यह व्यथा अपने पिता को सुनायी। दक्ष प्रजापति ने इसके लिए चंद्र देव को नाना प्रकार से समझाया। किंतु रोहिणी के वशीभूत चंद्रमा के हृदय पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
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अंततः दक्ष ने क्रुद्ध होकर उन्हें क्षयी हो जाने का शाप दे दिया। इस शाप के कारण चंद्रदेव तत्काल क्षयग्रस्त हो गये। उनके क्षयग्रस्त होते ही पृथ्वी पर सुधा-शीतलता-वर्षण का उनका सारा कार्य रुक गया। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गयी। चंद्रमा भी बहुत दुःखी व चिंतित थे। उनकी प्रार्थना सुनकर इंद्रादि देवता तथा वसिष्ठ आदि ऋषिगण उनके उद्धार के लिए पितामह ब्रह्मा जी के पास गये। सारी बातों को सुनकर ब्रह्मा जी ने कहा कि चंद्रमा अपने शाप विमोचन के लिए अन्य देवों के साथ पवित्र प्रभास क्षेत्र में जाकर मृत्युंजय भगवान की आराधना करें। उनकी कृपा से अवश्य ही इनका शाप नष्ट हो जाएगा और ये रोग मुक्त हो जायेंगे।
उनके कथनानुसार चंद्रमा ने मृत्युंजय भगवान की आराधना की। घोर तपस्या करते हुए दस करोड़ मृत्युंजय मंत्र का जाप किया। इससे प्रसन्न होकर मृत्युंजय भगवान ने उन्हें अमरत्व का वर प्रदान किया। भगवान मृत्युंजय ने कहा कि चंद्रदे! मेरे वर से तुम्हारे शाप का मोचन तो होगा ही, साथ ही प्रजापति के वचनों की रक्षा भी हो जाएगी। कृष्ण पक्ष में प्रतिदिन तुम्हारी एक-एक कला क्षीण होगी, किंतु पुनः शुक्ल पक्ष में उसी क्रम से तुम्हारी एक-एक कला जाया करेगी।
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