श्री कैलाश मानसरोवर

राकेश Updated Mon, 16 Jul 2012 12:00 PM IST
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हिंदुओं के लिए कैलाश शिव का सिंहासन है और बौद्धों के लिए एक विशाल प्राकृतिक मंडल। लेकिन दोनों इसे तांत्रिक शक्तियों का भंडार मानते हैं। यद्यपि भौगोलिक दृष्टि से यह चीन में स्थित है, तो भी यह हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों तथा तिब्बती लामाओं के लिए अत्यंत प्राचीन तीर्थस्थल रहा है। कैलाश की छाया में पवित्र मानसरोवर झील है। चारों धर्मों के तीर्थ यात्रियों द्वारा इस पिरामिड के आकार की 22, 028 फीट ऊंची बर्फ से ढकी चट्टान (कैलाश पर्वत) का अलग-अलग महत्व है। मानसरोवर एक 15 मील चौड़ी, वृत्ताकार गहरी नीली झील है।
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हिंदुओं का विश्वास है कि इसके चारों ओर 32 मील की परिक्रमा करने से जीवन के सभी पाप मिट जाते हैं। कैलाश को गणपर्वत और रजतगिरि भी कहते हैं। इस प्रदेश को मानसखंड भी कहा जाता है। प्राचीन साहित्य में उल्लिखित मेरू भी यही है। पौराणिक अनुश्रुतियों के अनुसार शिव और ब्रह्मा, देवगण मरीच आदि ऋषि एवं रावण, भस्मासुर आदि ने यहां तप किया था।
युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में इस प्रदेश के राजा ने उत्तम घोड़े, सोना, रत्न और याक के पूंछ के बने काले और सफेद चामर भेंट किए थे। इस प्रदेश की यात्रा व्यास, भीम, कृष्ण, दत्तात्रेय आदि ने की थी। इनके अतिरिक्त अन्य अनेक ऋषियों-मुनियों के यहां निवास करने का उल्लेख प्राप्त होता है। कुछ लोगों का कहना है कि आदि शंकराचार्य ने इसी के आसपास कहीं अपना शरीर त्याग किया था। यह विश्वास किया जाता है कि यह सिंधु, सतलज, ब्रह्मपुत्र तथा करनाली, चार नदियों का उद्गम क्षेत्र था। हिंदुओं का विश्वास है कि गंगा स्वर्गलोक से यहीं पर उतरती है और चार नदियों में विभाजित हो जाती है, जो धरती के एक बड़े भूभाग का जीवन आधार है।



जैन धर्म में भी इस स्थान का महत्व है। वे कैलाश को अष्टापद कहते हैं। कहा जाता है कि प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ने यहीं निर्वाण प्राप्त किया था। बौद्ध साहित्य में मानसरोवर का उल्लेख ‘अनवतप्त’ के रूप में हुआ है। बौद्ध अनुश्रुति है कि कैलाश पृथ्वी के मध्य भाग में स्थित है। डेमचौक (धर्मपाल) वहां के अधिष्ठाता देव हैं। वे व्याघ्र चर्म धारण करते हैं, मुंडमाल पहनते हैं। उनके हाथ में डमरू और त्रिशूल है। वज्र उनकी शक्ति है। ग्यारहवीं शती में सिद्ध मिलैरेपा इस प्रदेश में अनेक वर्ष तक रहे। विक्रम-शिला के प्रमुख आचार्य दीप शंकर श्रीज्ञान (982-1054 ई.) तिब्बत नरेश के आमंत्रण पर बौद्ध धर्म के प्रचारार्थ यहां आए थे।



कैलाश पर्वतमाला कश्मीर से लेकर भूटान तक फैली हुई है। ल्हाचू और झोंगचू के बीच कैलाश पर्वत है, जिसके ऊपरी शिखर का नाम कैलाश है। इस शिखर की आकृति विराट शिवलिंग की तरह है। पर्वतों से बने षोडशदल कमल के मध्य यह स्थित है। यह सदैव बर्फ से आच्छादित रहता है। तिब्बती (भोटिया) लोग कैलाश मानसरोवर की तीन अथवा तेरह परिक्रमा का महत्व मानते हैं और अनेक यात्री दंड प्राणिपात करके परिक्रमा पूरी करते हैं। उनकी धारणा है कि एक परिक्रमा करने से एक जन्म का और दस परिक्रमा करने से एक कल्प का पाप नष्ट हो जाता है। जो 108 परिक्रमा पूरी करते हैं, उन्हें जन्म-मरण से मुक्ति मिल जाती है।



कैलाश-मानसरोवर जाने के अनेक मार्ग हैं, लेकिन अल्मोड़ा से अस्कोट, नार्विंग, लिपूलेह, खिंड, तकलाकोट होकर जाने वाला मार्ग अपेक्षाकृत सुगम है। यह भाग 690 मील लंबा है। इसमें अनेक उतार-चढ़ाव हैं। जाते समय सरलकोट तक 44 मील की चढ़ाई है और उसके आगे 46 मील उतराई है। तकलाकोट तिब्बत स्थित पहला गांव है, जहां प्रतिवर्ष ज्येष्ठ से कार्तिक तक बड़ा बाजार लगता है। तकलाकोट से तारचैन आने के मार्ग में मानसरोवर पड़ता है। कैलाश की परिक्रमा तारचैन से आरंभ होकर वहीं समाप्त होती है।



तरकोट से 25 मील पर मंधाता पर्वत स्थित गुलैला का दर्रा 16,200 फुट की ऊंचाई पर है। इसके मध्य में पहले बाईं ओर मानसरोवर और दाईं ओर राक्षस ताल है। उत्तर की ओर दूर ही से कैलाश पर्वत के हिमाच्छादित धवल शिखर का रमणीय दृश्य दिखाई देता है। दर्रा समाप्त होने पर तीर्थपुरी नामक स्थान है, जहां गर्म पानी के झरने हैं। इन झरनों के आसपास चूनखड़ी के टीले हैं। कहा जाता है कि यहां भस्मासुर ने तप किया और यहीं वह भस्म भी हुआ था। इसके निकट ही गौरीकुंड है। मार्ग में स्थान-स्थान पर तिब्बती लामाओं के मठ हैं। इस प्रदेश में एक सुवासित वनस्पति होती है जिसे कैलाश धूप कहते हैं। लोग उसे प्रसादस्वरूप लाते हैं।
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