श्री महाकालेश्वर

राकेश Updated Mon, 16 Jul 2012 12:00 PM IST
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यह परमपवित्र ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश प्रांत में क्षिप्रा नदी के तट पर उज्जैन नगर में अवस्थित है। उज्जैनी के नाम से विख्यात इस नगरी को अवन्तिकापुरी भी कहते हैं। यह भारत की परमपवित्र सप्तपुरियों में से एक है। इस ज्योतिर्लिंग की कथा पुराणों में इस प्रकार बतायी गयी है। प्राचीनकाल में उज्जयिनी में राजा चंद्रसेन राज्य करते थे। वह परम शिव भक्त थे। एक दिन श्रीकर नामक एक पांच वर्ष का गोप बालक अपनी मां के साथ उधर से गुजर रहा था।
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राजा का शिव पूजन देखकर उसे बहुत विस्मय और कौतूहल हुआ। वह स्वयं उसी प्रकार की सामग्रियों से शिव पूजन करने के लिए लालायित हो उठा। सामग्री का साधन न जुट पाने पर लौटते समय उसने रास्ते से पत्थर का एक टुकड़ा उठा लिया। घर आकर उसी पत्थर के टुकड़े को शिव रूप में स्थापित कर पुष्प, चंदन आदि से परम श्रद्धापूर्वक पूजने लगा। माता भोजन के लिए बुलाने आयी, किंतु वह पूजा छोड़कर उठने के लिए तैयार नहीं हुआ। अंत में झल्लाकर माता ने पत्थर के टुकड़े को उठाकर दूर फेंक दिया।
इससे बहुत दुखी होकर बालक जोर-जोर से भगवान शिव को पुकारने लगा। रोते-रोते अंत में बेहोश होकर बालक वहीं गिर पड़ा। बालक का अनुराग देखकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। बालक ने ज्यो ही होश में आकर नेत्र खोले तो उसने देखा कि उसके सामने एक बहुत ही भव्य और अति विशाल स्वर्ण और रत्नों से बना हुआ मंदिर खड़ा है। उस मंदिर के अंदर एक बहुत ही आनंदविभोर करने वाला ज्योतिर्लिंग स्थापित है। राजा चंद्रदेव यह समाचार पाकर बहुत प्रसन्न हुए। धीरे-धीरे वहां भीड़ लग गई। भगवान हनुमान जी भी वहां प्रकट हुए। उन्होंने कहा कि भगवान शिव देवताओं में शीघ्र फल देने वाले हैं।



इस ज्योतिर्लिंग के बारे में एक दूसरी कथा प्रचलित है। किसी समय अवन्तिकापुरी में अत्यंत तेजस्वी ब्राह्मण रहते थे। एक दिन दूषण नामक एक अत्याचारी ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए वहां आया। ब्रह्मा जी के वर से वह बहुत शक्तिशाली हो गया था। उसके अत्याचारों से चारों ओर त्राहि-त्राहि मची हुई थी। ब्राह्मणों को कष्ट में पड़ा हुआ देखकर प्राणिमात्र का कल्याण करने भगवान शंकर वहां प्रकट हो गए। इसीलिए उनका नाम महाकाल पड़ गया।
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