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श्री भीमेश्वर

Arvind Thakurअरविन्द ठाकुर Updated Mon, 16 Jul 2012 12:00 PM IST
sri vimeshwar jyoterlinga
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यह ज्योतिर्लिंग गोहाटी के पास ब्रह्मपुर पहाड़ी पर अवस्थित है। शिवपुराण में इस प्रकार की कथा आयी है कि प्राचीनकाल में भीम नामक एक महाप्रतापी राक्षस था। वह कामरूप प्रदेश में अपनी मां के साथ रहता था। वह कुंभकर्ण का पुत्र था लेकिन उसने अपने पिता को नहीं देखा था। होश संभालने के पूर्व ही भगवान राम के द्वारा कुंभकर्ण का वध कर दिया गया था। जब वह युवावस्था को प्राप्त हुआ तब उसकी माता ने उससे सारी बातें बतायीं। भगवान विष्णु के अवतार श्रीरामचंद्र जी द्वारा अपने पिता के वध की बात सुनकर वह महाबली राक्षस अत्यंत सन्तप्त और कुंद्ध हो उठा। अब वह निरंतर भगवान श्री हरि के वध का उपाय सोचने लगा। उसने अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिए एक हजार वर्ष तक कठिन तपस्या की।
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उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे लोकविजयी होने का वर दे दिया। राक्षस ब्रह्मा जी के उस वर के प्रभाव से सारे प्राणियों को पीड़ित करने लगा। उसने देवलोक पर आक्रमण करके इंद्र आदि सारे देवताओं को वहां से बाहर निकाल दिया। पूरे देवलोक पर अब भीम का अधिकार हो गया। इसके बाद उसने भगवान श्री हरि को भी युद्ध में परास्त किया। श्री हरि को युद्ध में पराजित करने के पश्चात उसने कामरूप के परम शिव भक्त राजा सुदक्षिण पर आक्रमण करके उन्हें मंत्रियों, अनुचरों सहित बंदी बना लिया। इस प्रकार धीरे-धीरे उसने समस्त लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। उसके अत्याचार से वेदों, पुराणों, शास्त्रों और स्मृतियों का एकदम लोप हो गया। वह किसी को कोई धार्मिक कृत्य नहीं करने देता था।



अत्याचार से भयाक्रांत ऋषि-मुनि शिव की शरण में गये। उनकी प्रार्थना सुन भगवान शिव ने कहा कि, मैं शीघ्र ही उस अत्याचारी राक्षस का संहार करूंगा।’’ उधर राक्षस भीम के बंदीगृह में राजा सुदक्षिण ने भगवान शिव का ध्यान किया। वे अपने सामने पार्थिव शिवलिंग रख अर्चना करने लगे। ऐसा करते देख क्रोधोन्मत राक्षस भीम ने अपनी तलवार से शिवलिंग पर प्रहार किया। किंतु उसकी तलवार का स्पर्श उस लिंग से हो भी नहीं पाया कि उसके भीतर से साक्षात भूतभावन शंकर जी प्रकट हो गए। उन्होंने अपनी हुंकार से राक्षस भीम को भस्म कर दिया। भगवान शिव का कृत्य देख देवगण वहां एकत्र हो गए और स्तुति करने लगे। देवताओं ने शिव से प्रार्थना की कि लोककल्याणार्थ आप यहीं निवास करें। देवों की प्रार्थना स्वीकार कर शिव सदा के लिए वहां ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हो गए।

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