श्री विश्वेश्वर

राकेश Updated Mon, 16 Jul 2012 12:00 PM IST
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यह ज्योतिर्लिंग उत्तर भारत की प्रसिद्ध नगरी काशी में स्थित है। काशी के बारे में मान्यता है कि प्रलयकाल में भी इसका लोप नहीं होता। प्रलयकाल में भूतभावन भगवान शिव इस नगरी को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं और सृष्टिकाल आने पर पुनः यथास्थान अवस्थित कर देते हैं। सृष्टि की आदिस्थली भी इसी नगरी को बताया जाता है। भगवान विष्णु ने इसी स्थान पर सृष्टि कामना से तपस्या करके भगवान शंकर जी को प्रसन्न किया था।
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अगस्त मुनि ने भी इसी स्थान पर अपनी तपस्या द्वारा भगवान शिव को संतुष्ट किया था। इस पवित्र नगरी की महिमा ऐसी है कि यहां जो भी प्राणी अपने प्राण त्याग करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान शंकर उसके कान में तारक मंत्र का उपदेश करते हैं। इस मंत्र के प्रभाव से पापी से पापी प्राणी भी सहज ही भवसागर की बाधाओं से पार हो जाते हैं। विषयों में आसक्त, अधर्मनिरत व्यक्ति भी यदि इस काशी में मृत्यु को प्राप्त हो तो उसे भी पुनः संसार बंधन में नहीं जाना पड़ता। मत्स्यपुराण में इस नगरी का महत्व बताते हुए कहा गया है कि जप, ध्यान और ज्ञानरहित तथा दुखों से पीड़ित मनुष्यों के लिए काशी ही एकमात्र परमगति है।
श्री विश्वेश्वर के आनंद-कानन में दशाश्वमेध, लोलार्क, बिंदुमाधव, केशव और मणिकार्णिका ये पांच प्रधान तीर्थ हैं। इसी कारण इसे अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है। इस परम पवित्र नगरी के उत्तर की तरफ ओंकार खंड, दक्षिण में केदारखंड और बीच में विश्वेश्वर खंड अवस्थित है। पुराणों में इस ज्योतिर्लिंग के बारे में कथा दी गई है कि भगवान शंकर पार्वती का पाणिग्रहण करके कैलास पर्वत पर रह रहे थे। लेकिन वहां पिता के घर में ही विवाहित जीवन बिताना पार्वती जी को अच्छा नहीं लग रहा था। एक दिन उन्होंने भगवान शिव से कहा कि आप मुझे अपने घर ले चलिये। यहां रहना मुझे अच्छा नहीं लगता। सारी लड़कियां शादी के बाद अपने पति के घर जाती हैं, मुझे पिता के घर ही रहना पड़ रहा है। यह ज्योतिर्लिंग उत्तर भारत की प्रसिद्ध नगरी काशी में स्थित है। काशी के बारे में मान्यता है कि प्रलयकाल में भी इसका लोप नहीं होता। प्रलयकाल में भूतभावन भगवान शिव इस नगरी को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं और सृष्टिकाल आने पर पुनः यथास्थान अवस्थित कर देते हैं।



सृष्टि की आदिस्थली भी इसी नगरी को बताया जाता है। भगवान विष्णु ने इसी स्थान पर सृष्टि कामना से तपस्या करके भगवान शंकर जी को प्रसन्न किया था। अगस्त मुनि ने भी इसी स्थान पर अपनी तपस्या द्वारा भगवान शिव को संतुष्ट किया था। इस पवित्र नगरी की महिमा ऐसी है कि यहां जो भी प्राणी अपने प्राण त्याग करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान शंकर उसके कान में तारक मंत्र का उपदेश करते हैं। इस मंत्र के प्रभाव से पापी से पापी प्राणी भी सहज ही भवसागर की बाधाओं से पार हो जाते हैं। विषयों में आसक्त, अधर्मनिरत व्यक्ति भी यदि इस काशी में मृत्यु को प्राप्त हो तो उसे भी पुनः संसार बंधन में नहीं जाना पड़ता। मत्स्यपुराण में इस नगरी का महत्व बताते हुए कहा गया है कि जप, ध्यान और ज्ञानरहित तथा दुखों से पीड़ित मनुष्यों के लिए काशी ही एकमात्र परमगति है। श्री विश्वेश्वर के आनंद-कानन में दशाश्वमेध, लोलार्क, बिंदुमाधव, केशव और मणिकार्णिका ये पांच प्रधान तीर्थ हैं।



इसी कारण इसे अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है। इस परम पवित्र नगरी के उत्तर की तरफ ओंकार खंड, दक्षिण में केदारखंड और बीच में विश्वेश्वर खंड अवस्थित है। पुराणों में इस ज्योतिर्लिंग के बारे में कथा दी गई है कि भगवान शंकर पार्वती का पाणिग्रहण करके कैलास पर्वत पर रह रहे थे। लेकिन वहां पिता के घर में ही विवाहित जीवन बिताना पार्वती जी को अच्छा नहीं लग रहा था। एक दिन उन्होंने भगवान शिव से कहा कि आप मुझे अपने घर ले चलिये। यहां रहना मुझे अच्छा नहीं लगता। सारी लड़कियां शादी के बाद अपने पति के घर जाती हैं, मुझे पिता के घर ही रहना पड़ रहा है। भगवान शिव ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। वह माता पार्वती जी को साथ लेकर अपनी पवित्र नगरी काशी में आ गये। यहां आकर वे विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हो गए।



शास्त्रों में इस ज्योतिर्लिंग की महिमा का निगदन पुष्कल रूपों में किया गया है। इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन-पूजन द्वारा मनुष्य समस्त पापों-तापों से छुटकारा पा जाता है। प्रतिदिन नियम से श्री विश्वेश्वर के दर्शन करने वाले भक्तों के योग क्षेम का समस्त भार भूतभावन भगवान शंकर अपने ऊपर ले लेते हैं। ऐसा भक्त उनके परमधाम का अधिकारी बन जाता है। भगवान शिव की कृपा उस पर सदैव बनी रहती है। रोग, शोक, दुख, दैन्य भूलकर भी उसके पास नहीं जाते।
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