श्री नागेश्वर

राकेश Updated Mon, 16 Jul 2012 12:00 PM IST
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भगवान शिव का यह प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग गुजरात प्रांत में द्वारिकापुरी से लगभग 17 मील की दूरी पर स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग के बारे में पुराणों में यह कथा दी हुई है कि सुप्रिय नामक एक बड़ा धर्मात्मा और सदाचारी वैश्य था। वह भगवान शिव का अनन्य भक्त था। वह निरन्तर उनके आराधन, पूजन और ध्यान में तल्लीन रहता था। अपने सारे कार्य वह भगवान शिव को अर्पित करके करता था।
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मन, वचन व कर्म से वह पूर्णतः शिवार्चन में ही तल्लीन रहता था। उसकी इस शिव भक्ति से दारुक नामक एक राक्षस बहुत क्रुद्घ रहता था। वह इस बात का निरंतर प्रयत्न करता था कि सुप्रिय की पूजा अर्चना में विघ्न पहुंचे। एक बार सुप्रिय नौका पर सवार होकर कहीं जा रहा था। उस दुष्ट राक्षस दारुक ने यह उपयुक्त अवसर देखकर नौका पर आक्रमण कर दिया। उसने नौका में सवार सभी यात्रियों को पकड़कर अपनी राजधानी ले जाकर कैद कर दिया।
सुप्रिय कारागार में भी नित्य भगवान शिव की पूजा आराधना करने लगा। अन्य बंदी यात्रियों को भी वह शिव भक्ति की प्रेरणा देने लगा। दारुक ने जब अपने सेवकों से सुप्रिय के बारे में यह समाचार सुना तो वह अत्यंत क्रुद्घ होकर उस करागार में आ पहुंचा। सुप्रिय उस समय भगवान शिव के चरणों में ध्यान लगाए हुए दोनों आंखें बंद किए बैठा था। राक्षस ने उसकी यह मुद्रा देखकर भीषण स्वर में डांटते हुए कहा कौन से उपद्रव और षडयंत्र में लीन हो। उसके यह कहने पर भी शिव भक्त सुप्रिय वैश्य की समाधि भंग नहीं हुई।

इससे राक्षस दारुक क्रोध से तमतमा गया। उसने अपने अनुचरों से सुप्रिय और दूसरे बंदियों का तत्काल वध करने का आदेश दिया। सुप्रिय इससे अविचलित रहा। वह अपनी और अन्य बंदियों की रक्षा के लिए भगवान शिव की आराधना करने लगा। उसकी प्रार्थना सुनकर भगवान शंकर तत्क्षण उस कारागार में एक ऊंचे स्थान में एक चमकते हुए सिंहासन पर स्थित होकर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रगट हुए। उन्होंने इस प्रकार सुप्रिय को दर्शन देकर उसे अपना पाशुपत अस्त्र भी प्रदान किया। उस अस्त्र से राक्षस दारुक तथा उसके अनुचरों का वध करके सुप्रिय शिवधाम को चला गया। भगवान शिव के आदेश से ही इस ज्योतिर्लिंग का नाम नागेश्वर पड़ा।
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