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खुले में शौच की प्रथा खत्म करने में उत्तर-पूर्वी राज्य फिसड्डी

नई दिल्ली/अमर उजाला ब्यूरो Updated Fri, 25 May 2012 12:00 PM IST
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विद्या बालन को स्वच्छता अभियान का ब्रांड अंबेसडर बनाकर केंद्र सरकार भले ही अगले तीन-चार वर्षों में देश को खुले में शौच की प्रथा से मुक्त कराने का सपना देख रही हो, लेकिन राज्य अभी इस डर्टी पिक्चर को साफ करने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हैं।
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खासकर उत्तर व पूर्वी भारत के बड़े राज्य 10 साल से पहले इस लक्ष्य को पूरा करने में अपनी लाचारी जता रहे हैं। वैसे केंद्र सरकार ने अभियान को गति देने के लिए घर में शौचालय बनाने के लिए दी जाने वाली राशि में लगभग सौ फीसदी की बढ़ोतरी की घोषणा की है। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश और बिहार ने अगले 10 वर्षों में स्वच्छता अभियान को पूरा करने की बात कही है।

राज्यों के शुद्ध पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रियों के साथ शुक्रवार को आयोजित समीक्षा बैठक में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने बताया कि ज्यादातर राज्यों ने स्वच्छता को प्राथमिकता देने की बात कही है। इसके बावजूद खुले में शौच प्रथा को जड़ से समाप्त करने के लिए उन्होंने अधिकतम दस वर्ष की समय सीमा निर्धारित की है।

उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य इसमें प्रमुख हैं। जहां तक उत्तर भारत की बात है तो हिमाचल प्रदेश और हरियाणा की स्थिति इस मामले में अच्छी कही जा सकती है। वे पूरी गंभीरता से इस अभियान में जुटे हुए हैं।

रमेश के मुताबिक खुले में शौच को अब मजबूरी नहीं कहा जा सकता। इसके लिए सिर्फ जागरूकता की जरूरत है, क्योंकि घर में शौचालय के निर्माण के लिए केंद्र व राज्य मिलकर धन उपलब्ध करा रहे हैं। महंगाई के साथ लागत बढ़ी है। इसलिए सरकार ने शौचालय निर्माण की राशि में लगभग सौ फीसदी की बढ़ोतरी कर दी है।

अभी शौचालय निर्माण के लिए प्रत्येक परिवार को 4400 रुपये मिलते हैं, इसमें केंद्र सरकार 2200 रुपये, राज्य सरकार 1000 रुपये और मनरेगा के जरिए 1200 रुपये की सहायता दी जाती है। इसके अलावा 300 रुपये परिवार को खुद वहन करने होते हैं। अब केंद्र इसके लिए 3100 रुपये, राज्य 1400 रुपये और मनरेगा के जरिए 4500 रुपये की राशि दी जाएगी। परिवार को अपने स्तर से 900 रुपये खर्च करने होंगे।

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