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क्या सुनील दत्त की राजनीति में फंस गए संजय दत्त?

वेद विलास उनियाल Updated Thu, 21 Mar 2013 09:09 PM IST
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is sanjay dutt became victim of sunil dutt politics
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कहा जाता है कि महाराष्ट्र की राजनीति में सुनील दत्त के चढ़ते रथ को रोकने में उनके विरोधियों के हाथ जो अस्त्र लगा उसी का नाम संजय दत्त है।
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1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जिस तरह कांग्रेस ने फिल्म सितारों को राजनीति की मुख्यधारा में जोड़ने की पहल की उसमें सुनील दत्त को शामिल किया जाना स्वाभाविक था।

वह रामजेठमलानी के खिलाफ अपना चुनाव आसानी से जीत गए।

तब यह लगा कि सुनील दत्त की सितारा फिल्मों की तरह राजनीति में भी चमकेगा और महाराष्ट्र की कर्मभूमि उनके लिए उर्वर साबित होगी। वह राज्य की कांग्रेसी जमीन पर उत्तर भारतीयों को अपना नेतृत्व देंगे।

शायद इसी कल्पना के साथ साथ उन राजनीतिक दिग्गजों के लिए भी कोई संदेश रहा होगा, जिन्हें सुनील दत्त के रुप में अपना प्रतिद्वंद्विता साफ नजर आई होगी।

इसकी छाया तब साफ दिखी जब मुंबई ब्लास्ट केस में संजय दत्त लपेटे में आए तो उनकी मदद के लिए कांग्रेसी नहीं, बल्कि बाल ठाकरे आगे आए।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि सुनील दत्त भले ही कांग्रेस में बने रहे, लेकिन कोई बात उन्हें कचोटती रही।

कांग्रेस की असहजता
वो कभी मुरली देवड़ा से समरस नहीं हुए, तो वह दिन भी आया जब शिवसेना से निकल कर कांग्रेस में आए संजय निरूपम उन्हें परेशान कर रहे थे।

राजनीति के इन उहापोह में एक बात साफ रही कि भले ही जेल से निकल कर संजय दत्त राजनीतिक पार्टियों के प्रचार कर रहे हों, या फिर फिल्म बना रहे हों, लेकिन उनके पिता सुनील दत्त कभी सहज नहीं हो पाए।

उन्होंने बेशक कांग्रेसजनों के प्रति अपनी खुली नाराजगी न जताई हो, लेकिन जब तब खुले रूप से शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की प्रशंसा के कई निहितार्थ थे।

खासकर जब वह कहते थे कि उस संकट के समय बाल ठाकरे ने ही मेरी मदद की।

और उस समय भी जब उन पर शिवसेना से करीबी संबंधों को लेकर आक्षेप लगे तो उन्होंने कहा, "यह जरूर है कि मैं बाल ठाकरे का सम्मान करता हूं, उन्होंने मेरी मुश्किल की घड़ी में जो मदद की उसके प्रति आभार व्यक्त करता हूं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मैं कांग्रेस छोड़ रहा हूं। या इस पार्टी के प्रति वफादार नहीं हूं। राजनीति अपनी जगह , मित्रता अपनी जगह।"

इन वाक्यों में ही सुनील दत्त की सारी कशमकश समझ में आ जाती है।

बेगुनाही साबित कराना चाहते थे सुनील दत्त
संजय दत्त पर ये आरोप साबित हुए कि वे हथियार जमा करके रखने की एक कड़ी के रूप में थे। फिर ये आरोप चाहे मासूमियत में ही कहीं उलझा हो।

सुनील दत्त की सारी जद्दोजहद इसी बात पर थी कि उनके बेटे की बेगुनाही सामने आए। उसे जिस तरह घेरा गया है उस फंदे से वो बाहर आए।

सुनील दत्त शायद ये नहीं चाहते थे कि उनके बेटे को किसी भी तरह बचाया जाए। बल्कि वह कानून और तमाम चीजों पर अपने पक्ष को रखते हुए उसकी बेगुनाही साबित कराना चाहते थे।

इसके लिए उन्हें हर तरफ मदद की दरकार थी। सबसे ज्यादा तो अपने ही घर से, यानी कांग्रेस से। उन्हें निराश ही होना पड़ा।

महाराष्ट्र में शरद पवार, मुरली देवड़ा या फिर दूसरे ऊंचे रसूख वाले हर नेता की तरफ उन्होंने नजर उठाई, मगर उन्हें निराश ही होना पड़ा।

सुनील दत्त की जिंदगी फिर से अपने बेटे को लेकर स्याह बन चुकी थी।

पहले तो केवल ड्रग्स लेने की बात थी, लेकिन इस बार तो उसके चरित्र और देश के प्रति निष्ठा पर ही सवाल उठ रहे थे। सुनील दत्त इसी लड़ाई में उलझ गए। बल्कि अंत तक उलझे रहे।

राजनीति में उन्हें जिस मुकाम तक जाना था, वहां नहीं पहुंचे।

संजय दत्त उलझे रह गए
सुनील दत्त को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष तनाव में लाने, तंग करने के लिए दूसरों के लिए संजय दत्त चाबी की तरह थे। इसका इस्तेमाल होता रहा।

एक समय ऐसा भी आया जब उनकी शिकायत शिवसेना से कांग्रेस में आए संजय निरूपम को लेकर हुईं। इसपर भी गौर नहीं हुआ।

एक तरह से अपनी लडाई में सुनील दत्त अकेले रह गए। और यह भी देखा गया कि उनके निधन के बाद उनकी सीट पर संजय दत्त, उनकी बहन प्रिया दत्त और संजय निरूपम की अपनी अपनी तरह से दावेदारी हुई।

संजय निरूपम और प्रिया ने तो अपने लिए बिसात बिछा दी पर संजय दत्त उलझे रह गए। पिछला दौर उनके साथ साए की तरह चलता रहा है। आज भी चल रहा है।

आज जब संजय दत्त को सुप्रीम कोर्ट से सजा सुनाई गई है, तो उनकी बहन प्रिया दत्त रोते हुए यही कह सकीं कि वह कुछ कहने की स्थिति में नहीं है।

परिवार से जुड़े होने से उन्हें संजय दत्त से जुड़े भी रहना है और राजनीति में होने से अलग भी दिखना है। यही उनके लिए विडंबना है। उनके लिए भी राजनीति की राह कुछ ज्यादा पथरीली हो गई है।

सुनील दत्त की विरासत की राजनीति महाराष्ट्र की एक संसदीय सीट पर सिमटी है। उसके भी बिखरने का डर है। संजय दत्त को जब अमर सिंह ने लपका तो फिर लगा कि समाजवादी पार्टी की छत्रछाया उनके लिए कुछ सहायक होगी।

इसी नाते वह महाराष्ट्र और उप्र में घुमाए जाने लगे। यहां तक कि उनके लिए सीट का भी चयन कर लिया गया। लेकिन बहुत जल्द अहसास हो गया कि गभीर आरोपों में घिरे होने से वह चुनाव लड़ना तो दूर, पार्टी के लिए प्रचार करना भी दिक्कत भरा हो रहा है।
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