चीनी निर्यात में उत्तर प्रदेश फिसड्डी

Market Updated Tue, 12 Jun 2012 12:00 PM IST
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गन्ना किसानों के बकाये का भुगतान करने के लिए चीनी निर्यात का दबाव बनाने वाली उत्तर प्रदेश की मिलें ही निर्यात में फिसड्डी साबित हुई हैं। खुले सामान्य लाइसेंस (ओजीएल) के तहत अनुमति मिलने के एक माह बीत जाने के बावजूद सबसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश से एक दाना भी चीनी का निर्यात नहीं हुआ है। जबकि सबसे ज्यादा चीनी उत्पादक राज्य महाराष्ट्र की स्थिति दूसरे नंबर पर रही। एक महीने में तमिलनाडु की मिलों ने सर्वाघिक 1.25 लाख टन चीनी का निर्यात किया है।
उपभोक्ता मामले मंत्रालय के मुताबिक 11 मई से 11 जून तक ओजीएल के तहत चीनी का कुल निर्यात 2,65,424.90 टन हुआ है। इसमें सर्वाधिक 1,25,540.60 टन की हिस्सेदारी तमिलनाडु की रही। जबकि 73131 टन चीनी निर्यात करके महाराष्ट्र का स्थान दूसरे नंबर पर रहा। गुजरात की मिलों ने 48,334 टन और कर्नाटक की मिलों ने इस अवधि में 16,674.40 टन चीनी का निर्यात किया है। खासबात यह है कि ओजीएल के तहत निर्यात में पुडुचेरी की मिलों का प्रदर्शन बेहतर रहा।

महीने भर में राज्य की एक ही मिल से 1744.90 टन चीनी निर्यात हुई। मंत्रालय के मुताबिक रजिस्ट्रेशन की बाध्यता के बावजूद मिलों का चीनी निर्यात में प्रदर्शन अच्छा रहा। महीने भर में लगभग 3.25 लाख टन चीनी निर्यात के सौदे रजिस्टर्ड हुए हैं। लेकिन इस दौरान उत्तर प्रदेश से निर्यात नगण्य रहा। जाहिर है कि जबरदस्त उत्पादन के बावजूद चीनी की कमजोर खपत और लंबे समय से कीमतों में स्थिरता का रूख होने से उत्तर प्रदेश की मिलें आर्थिक संकट से जूझ रही हैं।

उत्तर प्रदेश में 24 अप्रैल तक हुई गन्ने की खरीद का मिलों पर लगभग 4,200 करोड़ रुपये से ज्यादा का बकाया था। हाल ही उच्चतम न्यायालय ने मिलों को गन्ने के बकाया भुगतान को तीन किस्तों में करने का आदेश दिया है। जिसके तहत मिलें पहली किस्त सात मई और दूसरी किस्त 7 जून को चुकता कर चुकी हैं। अदालत के आदेश पर मिलों को सात जुलाई को आखिरी किश्त के तौर पर बकाया का पूरा भुगतान करना है।

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