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विकास दर में गिरावट का कारण ब्याज नहीं

Market Updated Fri, 08 Jun 2012 12:00 PM IST
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रिजर्व बैंक द्वारा 18 जून की अपनी आगामी मौद्रिक समीक्षा में मूल दरें घटाने की उम्मीद अब कमजोर होती नजर आ रही है। आरबीआई के डिप्टी गवर्नर केसी चक्रवर्ती के ताजा बयान को इसी का संकेत माना जा रहा है। चक्रवर्ती ने देश के सकल घरेलू उत्पाद (उत्पाद) की विकास दर रफ्तार नौ वर्ष के न्यूनतम स्तर पर पहुंचने के पीछे उच्च ब्याज दर की महत्वपूर्ण भूमिका को नकारते हुए कहा है कि ब्याज दरों को आर्थिक विकास में बाधक बताना ठीक नहीं।


मुबंई में एक कार्यक्रम के दौरान चक्रवर्ती ने कहा कि विकास दर में दिखाई दे रहे धीमेपन के पीछे कई दूसरे कारक भी हैं। विकास दर में गिरावट के लिए उच्च ब्याज दर को कसूरवार ठहराए जाने पर चक्रवर्ती का कहना है कि केवल ब्याज दर में इजाफे के कारण विकास दर को झटका नहीं लगा है, बल्कि कई कारणों से यह प्रभावित हुआ है। लेकिन इस संदर्भ में ब्याज दर के पहलू को काफी उछाला जा रहा है।


हालांकि डिप्टी गर्वनर ने यह जरूर स्वीकार किया कि यह विकास दर की पीछे ले जाने वाले कारणों में से एक जरूर हो सकता है। उन्होंने यह माना कि ब्याज दरें विकास दर को प्रभावित करती हैं। दरअसल मुद्रास्फीति से विकास प्रभावित होता है। यदि मुद्रास्फीति दर में गिरावट होती है तो निश्चित तौर पर ब्याज दरें भी कम होंगी, लेकिन यह कहना गलत है कि केवल उच्च ब्याज दर के कारण विकास दर प्रभावित हुई है।

इस संदर्भ में लगातार निगरानी रखी जा रही है। डिप्टी गर्वनर ने कहा कि आरबीआई की पहली प्राथमिकता महंगाई को काबू में लाना है। उन्होंने इस दौरान यह भी कहा कि अभी यह पता नहीं है कि उत्पादकता और दक्षता में कमी और मुद्रास्फीति के कारण विकास दर में कितनी गिरावट आई है।

जानकारों का मानना है कि पिछले वित्त वर्ष में नौ वर्ष के न्यूनतम स्तर 6.5 फीसदी पर विकास दर चले जाने के पीछे सरकार के नीतिगत शिथिलता के साथ सख्त मौद्रिक निर्णय की भी अहम भूमिका है। दरअसल दोहरे अंकों में बनी मुद्रास्फीति दर पर अंकुश लगाने के लिए मार्च 2010 से अक्तूबर 2011 के बीच लगातार तेरह दफा प्रमुख ब्याज दरों में इजाफा किया था। इस दौरान ब्याज दरों में 375 आधार अंकों की बढ़ोतरी हुई थी, लेकिन इससे बाजार को विशेष लाभ नहीं पाया था। यही कारण है कि आरबीआई तमाम आलोचनाओं का शिकार हुआ है।

गौरतलब है कि आरबीआई के एक अन्य डिप्टी गवर्नर सुबीर गोकर्ण द्वारा पिछले दिनों दिए गए बयान से मूल दरों में कमी की उम्मीद जगी थी। गोकर्ण ने देश की आर्थिक विकास दर उम्मीद से कम रहने और महंगाई दर में गिरावट आने से नीतिगत दरों में कटौती की संभावनाएं बन रही हैं।
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इसके समर्थन में उन्होंने कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का भी हवाला दिया था। इससे पहले आरबीआई गवर्नर डा. डी सुब्बाराव ने भी विकास दर में सुधार के लिए ढांचागत बदलाव को जरूरी बताते हुए रिजर्व बैंक की ओर से इसमें हर संभव मदद का आश्वासन दिया था।

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