आर्थिक विकास दर 5.3 फीसदी, 9 साल में सबसे कम

Market Updated Thu, 31 May 2012 12:00 PM IST
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देश की अर्थव्यवस्था पर ग्लोबल के साथ-साथ घरेलू परिस्थितियां भारी पड़ती नजर आ रही हैं। इनके चलते अर्थव्यवस्था की धीमी पड़ती रफ्तार जल्द से जल्द उद्योगों में जान फूंकने के उपाय किए जाने की जरूरत की ओर साफ तौर पर इशारा कर रही है।
समाप्त वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही (जनवरी-मार्च 2012) के दौरान उत्पादन और कृषि क्षेत्र के कमजोर प्रदर्शन से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की रफ्तार करीब नौ वर्ष के न्यूनतम स्तर 5.3 प्रतिशत पर सिमट गई। बीते साल की समान तिमाही में विकास की रफ्तार 9.2 फीसदी थी।

केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) की तरफ से समाप्त वित्त वर्ष और अंतिम तिमाही के आंकडे़ जारी किए गए, जिसमें 2011-12 की जीडीपी की दर 2002-03 के बाद की न्यूनतम 6.5 प्रतिशत पर दर्ज की गई है। पहले इसके 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था। वर्ष 2010-11 में जीडीपी 8.4 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ी थी। वर्ष 2002-03 में जीडीपी में चार प्रतिशत की वृद्धि हुई थी और इसके बाद की यह सबसे कम बढ़ोतरी होगी।

जीडीपी में गिरावट का क्या होगा असर
- घट सकती है देश की क्रेडिट रेटिंग: बढ़ते राजकोषीय घाटा, रुपये में कमजोरी, निवेश के लिए माहौल खराब होने आदि के कारण ग्लोबल क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां देश की रेटिंग कम कर सकती हैं, जिससे समस्याएं और बढ़ सकती हैं।

- विदेशी निवेश में आ सकती है कमी: विकास दर में गिरावट के कारण देश में विदेशी निवेश का आना घट सकता है, क्योंकि रिटर्न के हिसाब से भारत हॉट नहीं रह जाएगा। अमेरिकी अर्थव्यवस्था जो नकारात्मक विकास दर की अर्थव्यवस्था थी, अब उसकी चाल भी तीन फीसदी तक के आसपास पहुंच गई है।

- रोजगार पर असर: विकास दर में गिरावट मंदी की ओर इशारा है। विदेशी निवेश के कम होने का असर यहां पहले से चल रहे उद्योगों के साथ ही नए उद्योगों पर भी होगा। इसके चलते रोजगार के अवसरों पर दबाव बढ़ेगा

- दबाव में रहेंगी उपभोक्ता सामान कंपनियां: कार जैसी चीजें बनाने वाली कंपनियां दबाव में आएंगी, क्योंकि रोजगार पर संकट आने से इनकी बिक्री में भारी गिरावट आ सकती है। इस क्षेत्र की कंपनियों के शेयर भी दबाव में रहेंगे।

- नई परियोजनाओं पर लग सकता है ब्रेक: विकास दर में गिरावट से एक ओर निवेश बाधित होगा और दूसरी ओर लोगों की खरीद क्षमता घटने से बाजार में सामान का उठाव कम होगा। वस्तु की मांग कम होने और निवेश की रकम बाधित होने से नई परियोजनाओं पर संकट रह सकता है।

- आम जनता की बढ़ेगी परेशानी: विकास दर में गिरावट से रोजगार के अवसर घटने के साथ ही महंगाई का दबाव भी लगातार बना रहेगा। पहले से ही महंगाई से त्रस्त जनता जेब में कम धन आने से और भी दबाव में आएगी जिससे उसे रोज रोज अपने खर्चे में कटौती के रास्ते तलाशने होंगे।

फिर भी कई देशों से हैं बेहतर: पीएम
22 मई, 2012 को यूपीए-2 के तीसरी वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री ने रिपोर्ट कार्ड पेश किया, जिसमें उन्होंने कहा कि बीता वर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए काफी कठिन रहा है, फिर भी भारतीय अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2011-12 में लगभग 7 फीसदी विकास दर हासिल की है, जो अन्य देशों के मुकाबले काफी बेहतर है।

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