औद्योगिक संगठनों को ठेंगा दिखाएगी सरकार

Corporate Updated Mon, 11 Jun 2012 12:00 PM IST
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रियल ईस्टेट विधेयक के मसौदे में बदलाव के लिए औद्योगिक संगठन सरकार की दहलीज पर चाहे जितना सिर पटक लें, केंद्र इस बिल को जस का तस संसद में पेश करके इन संगठनों को ठेंगा दिखाएगी। सरकार घर खरीदने वालों को नुकसान पहुंचाने की नीयत रखने वालों को कोई मौका देने के मूड में नहीं है।

आवास एवं शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय और कानून मंत्रालय ने प्रमुख औद्योगिक संगठनों की मांग के पूरी तरह से खिलाफ हैं। मंत्रालयों की मानें, तो उपभोक्ताओं के हित को ध्यान में रखकर तैयार किए गए इस विधेयक के मसौदे में यदि कोई बदलाव चाहता है तो स्पष्ट हो जाता है कि वह सिर्फ अपने फायदे की सोच रहा है।

सरकार ने रियल ईस्टेट डेवलपरों पर लगाम कसने के लिए ही इस विधेयक के मसौदे को 2011 में तैयार किया था। कानून मंत्रालय ने मसौदे पर अपनी मुहर लगाते हुए साफ कर दिया था कि रीयल ईस्टेट के विकास से जुड़े हर पहलू और पक्षों के हितों की सुरक्षा के यह कानून बहुत लाभकारी होगा।

हाल ही में सीआईआई, एसओचैम और फिक्की ने इस विधेयक के मसौदे में बदलाव की मांग की थी। जिसे सरकार ने नजरअंदाज कर दिया। सरकार ने हां और न, किसी भी तरह का जवाब इन संगठनों को महज इसलिए नहीं दिया क्योंकि वह इस मसले को तूल देने की बजाय विधेयक को जल्द से जल्द संसद में पेश करने के पक्ष में है।

वहीं संगठनों की मानें, तो इस विधेयक में प्रायोगिक तौर पर कई खामियां है जो इस क्षेत्र की कंपनियों की ही नहीं, बल्कि लोगों की परेशानी का कारण भी बन सकती हैं। जबकि मसौदा तैयार किए जाने के दौरान आवास एवं शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय यह पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि विधेयक में जमीन-जायदाद के विकास से जुड़ी कंपनियों और सभी पक्षों के हितों का ध्यान रखा गया है।

सूत्रों के अनुसार कानून मंत्रालय इस मामले में साफ कह चुका है कि यह विधेयक आवास क्षेत्र में सुधार का रास्ता साफ करेगा। इस विधेयक का मकसद है महज इतना है कि जमीन-जायदाद संपत्ति लोगों को आसानी से उपलब्ध हो। यदि इससे किसी को परेशानी होती है तो यह कहना गलत नहीं होगा कि वह अपने पक्ष का हित देख रहा है जो दूसरों के नुकसान का कारण भी बन सकता है।

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