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रुपये का गिरना नहीं रोक सकते

Banking-Insurance Updated Fri, 01 Jun 2012 12:00 PM IST
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रिजर्व बैंक ने कहा है कि यदि कमजोर बुनियादी या वैश्विक कारणों के चलते रुपये में गिरावट में आ रही है तो वह इसे नहीं रोक सकता है।
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रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर केसी चक्रवर्ती ने कहा कि यदि रुपये में बुनियादी कमजोरी की वजह से गिरावट आ रही है तो सरकार को व्यापार घाटे की समस्याओं को दूर करने पर ध्यान देना चाहिए। रुपये में गिरावट अर्थव्यवस्था की बुनियादी कमजोरी की वजह से आती है या वैश्विक कारणों के चलते ऐसा होता है तो आरबीआई इसमें कुछ नहीं कर सकता है।

उन्होंने कहा कि यदि रुपये में गिरावट अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में बनी स्थिति की वजह से आ रही है तो वित्तीय क्षेत्र में सुधार के उपायों से समस्या हल नहीं हो सकती है।

मालूम हो कि सभी प्रमुख मुद्राओं खास तौर पर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में लगातार गिरावट आ रही है। अप्रैल से चल रहे गिरावट के दौर में अब डॉलर के मुकाबले रुपया 56 के स्तर से भी नीचे आ गया है।

डॉलर की मांग को रोकने और रुपये को साधने के लिए चक्रवर्ती ने संकेत दिया कि तेल कंपनियों के लिए अलग डॉलर विंडो की व्यवस्था की जाएगी। मालूम हो कि रुपये की गिरावट के बीच चर्चा है कि तेल कंपनियों के लिए एक अलग विंडो की व्यवस्था कर उन्हें डॉलर सीधे बेचे जा सकते हैं।

देश में तेल कंपनियां डॉलर की सबसे बड़ी उपभोक्ता हैं। इस तरह खुले बाजार से डॉलर की मांग का दबाव कम होगा। देश के आयात बिल में पिछले दशकों में तेल की बड़ी हिस्सेदारी रही है। वित्त वर्ष 2011-12 में कुल आयात बिल 488.6 अरब डॉलर रहा, जिसमें से 155.6 अरब डॉलर तेल के आयात पर खर्च किए गए।

इस बीच, चक्रवर्ती ने 16 जून को होने वाली मौद्रिक नीति की समीक्षा का जिक्र किए बिना यह भी कहा कि यदि मुद्रास्फीति नीचे आती है तो ब्याज दरें कम हो सकती हैं।

--रुपये की कमजोरी के वैसे आधारभूत कारण, जो रिजर्व बैंक की जद के बाहर हैं

-सबसे बड़ा कारण है बढ़ता आयात
कच्चे तेल के आयात में जा रहे हैं बेशुमार डॉलर। 2011-12 में देश के कुल आयात पर खर्च हुए करीब 489 अरब डॉलर। इसमें से 156 अरब डॉलर सिर्फ कच्चे तेल के आयात में गए।

-बढ़ रहा है देश का राजकोषीय घाटा
देश के राजकोषीय घाटे में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। वित्तवर्ष 2011-12 में इसका आकलन 4.6 फीसदी था, जो बढ़कर हो गया 5.76 फीसदी।

-घटता जा रहा है विदेशी निवेश
विकास दर में गिरावट और ढांचागत सुधार जैसे जीएसटी, रिटेल सहित अन्य क्षेत्रों में एफडीआई पर राजनीतिक निर्णय की अनिश्चितता के कारण देश में विदेशी निवेश का आना कम होता जा रहा है।

साल भर में आई 24 फीसदी की गिरावट
दुनिया की प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले रुपया कमजोर हो रहा है, लेकिन सबसे अधिक गिरावट अमेरिकी डॉलर के सापेक्ष है। साल भर में इसमें करीब 24 फीसदी की गिरावट आ चुकी है।

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