सुबह निरूपा रॉय की आत्मा आ गई थी मेरी मां में

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इंटरनेट डेस्क Published by: Updated Wed, 10 Jul 2013 11:12 AM IST

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आज तो सुबह-सुबह निरूपा रॉय की आत्मा आ गई थी मेरी माँ की बॉडी में। मुंह से शहद टपकाते, बड़े ही प्यार से उन्होंने मुझे उठाया और चाय का ग्लास मेरे हाथों में थमा दिया। और पूछने लगी 'कॉलेज में सब कैसा चल रहा है? तुझे कोई तंग तो नहीं करता ना? या पढ़ाई-लिखाई में कोई दिक्कत तो नहीं आ रही?' मेरा तो सर चकरा गया था, लग रहा था कि अभी भी नींद में हूँ। पर मुझे अपनी माँ के सपने क्यूँ आ रहे हैं? खैर, गरमा-गरम चाय के ग्लास से जब मेरा हाथ चटका तो समझ आया के पिंकी ये सपना नहीं हक़ीकत है।
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मेरा दिमाग तुरंत खटका, पक्का वो करने आई हैं कुछ काण्ड। उतने में ही हमारी इच्छाधारी एनाकोंडा ने अपना असली रूप धरा। और शुरू हुआ उनका बेटी पुराण 'लड़की तो पराया धन होती है, तुझे शादी करके दुसरे घर जाना है। वहां ये सब पढ़ाई-वढ़ाई कुछ काम नहीं आएगी। कोई स्पेशल क्लासेस कर ले, वरना तेरी सास ताने देगी के माँ ने कुछ सिखा के नहीं भेजा'।

 
मैंने कहा मम्मी मुझे खाना बनाना आता है। घर के काम भी कर लेती हूँ, और क्या चाहिए। तो तपाक से मुझे न्यूज़ पेपर पकड़ा कर बोलीं 'तेरे को साड़ी पहनना आता है? शादी के बाद वही पहनना पड़ेगा। वहां तेरे ये सूट-जींस वगैरा नहीं चलेंगे। ये देख पास वाले भवन में साड़ी पहनने का कोर्स करवा रहे हैं।एक हफ्ते सुबह जल्दी उठके चली जायेगी तो घिस नहीं जायेगी।' यार अब ये साड़ी-वाड़ी वाला नाटक मुझे नहीं पसंद। मेरा बस चले टू पीस में पूरे घर में घूमूं... मेरी खुली आँखों के सपने को भी तोड़ते हुए मेरी माँ बोली 'देख पिंकी, तू कल से ये साड़ी क्लासेस में जा रही है और ये मैं पूछ नहीं रहीं हूँ, बता रहीं हूँ।'

कॉलेज में भी कुछ ख़ास नहीं हुआ आज, बस अविनाश ब्लैक शर्ट में क़ातिलाना लग रहा था। और मिस आस्था के कपड़े फटने को बेताब थे। उसे शर्म भी तो नहीं आती। आज उसका आई-कार्ड गिर गया था तो एक लड़के ने उठा लिया और अपने दोस्त से पूछने लगा 'ये कौन है बे?'तो उसका दोस्त बोला 'कभी उसकी शक्ल देख ली होती तो पता होता...'। ये लड़के कितने कुत्ते होते हैं ना। छोड़ो, कल सुबह जल्दी उठकर खुद को कपड़ों की थान में लपेटना है, तो आज जल्दी सोया जाए। गुड नाईट।

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