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समाज और मानसिकता: महत्वाकांक्षा और जिम्मेदारी के बीच अपंगता का सही अर्थ

लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवानी अवस्थी Updated Thu, 11 Aug 2022 06:24 PM IST
सार

कम पढ़ा-लिखा गरीब इंसान अपूर्ण शरीर से ही जीवन की लड़ाई सम्मानपूर्वक लड़ता है, वहीं उच्च शिक्षा-प्राप्त, सुविधाओं से सम्पन्न सज्जन शारीरिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से पूर्ण-सम्पूर्ण होते हुए भी अपने थोथे अहम के लिए अपंगों सा जीवन जी रहा है।

अपाहिज कैसे-कैसे
अपाहिज कैसे-कैसे - फोटो : istock
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विस्तार

बिमल सहगल



हमारे दैनिक जीवन में कई ऐसी घटनाएं घटती हैं या ऐसे दृश्य दिख जाते हैं जो हमें जीवन की संपूर्णता और सार्थकता पर एक बार फिर से विचार करने पर मजबूर कर जाते हैं। भगवान ने हमें दो हाथ, दो पैर और कई इंद्रियां दी हैं जिनसे हम में जीने की ललक बनी रहे और हम अपने जीवन के लक्ष्य को सार्थक कर सकें, पर विधि के किसी और विधान अनुरूप यह कृपा-दृष्टि सब पर हर समय नहीं रह पाती। दुर्घटना या बीमारी-वश बहुत से लोग अपंग हो जाते हैं। किसी अति महत्वपूर्ण अंग का न रहना जीवन की सार्थकता पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देता है और ऐसी स्थिति में बहुत से लोग तो जीवन से ही पलायन कर जाते हैं। पर क्या कोई मिथ्या महत्वाकांक्षा या थोथा लक्ष्य भी जीवन की सार्थकता हो सकता है? ऐसा लक्ष्य जो मात्र बेमानी अहम को संतुष्ट करने के लिए मनुष्य से उसकी परिपूर्णता ही छीन ले, उसको वर्षों तक अपाहिज बना दे?

महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए अपंगता की राह  

बात बहुत साल पहले की है जब हम दिल्ली के गोल मार्केट क्षेत्र में रहते थे। निवास से सटे बस-स्टैंड से रोज गुजरना होता था। पास के सरकारी क्वार्टरस में कहीं यह सज्जन रहते थे जिन्होंने किसी रिकॉर्ड बुक में नाम हासिल करने के लिए बायें हाथ के नाखुन बड़ा रखे थे। लगता था कि उनका यह प्रयास बीस-पच्चीस साल से जारी था। वह यहां से आफिस के लिए चार्टर्ड बस लेते थे। उनके कुंडल-दार नाखुन जिन पर वह सुरक्षा और मजबूती के लिए प्लास्टिक की काली टेप लगा कर रखते थे, लगभग जमीन को छूते रहते थे। भारी नाखूनों को जमीन से ऊंचा रखने के लिए उन्हे उस हाथ को मोड़ कर रखना पड़ता था। स्वाभाविक है ऐसे में उनका बायां हाथ न होने से भी बद्तर स्थिति में था।


उठने-बैठने, सोने, कहीं आने-जाने, नहाने-धोने, कपड़े बदलने और दूसरे दैनिक क्रिया-क्लाप में उनके यह नाखुन बहुत बड़ी बाधा रहे होंगे और उनके टूटने-चिटखने के हर वक्त के डर ने भी उनके मानस पर बहुत बड़ा प्रभाव डाल रखा होगा। पर उस इंसान ने भगवान द्वारा दिए अंगों को अमूल्य जीवन की सार्थकता का माध्यम न बना, किसी बहुत मामूली और बेमाने रिकार्ड की प्राप्ति के लक्ष्य में झोंक दिया था। 

जिम्मेदारी के सामने अपंगता हारी 

आम तौर पर ऐसी गहरी सोच के विचार कठिन हैं और हम अधिकतर ऐसे लोगों की व्यक्तिगत प्राप्ति पर प्रशंसा ही करते हैं। पर उस दिन के दृश्य ने मेरी सोच पर गहरी पैठ की जिसे मैं शायद कभी भूल नहीं पाऊंगा।  हुआ यूं कि यह सज्जन हमेशा कि तरह उस बस स्टैंड पर अपनी बस के इंतजार में थे कि तभी वहां सड़क पर एक ठेला आ रुका। ठेलेवाला आलू बेच रहा था। किसी आम दुकानदार की तरह वह जवान ठेलेवाला बहुत होशियारी से पलड़ों वाले तराजू से पांच-पांच किलो तक एक बार में तोलता।

उन दिनों आज की तरह सतह पर रखी जाने वाली तराजू का चलन नहीं था, पॉलिथीन बैग में उन्हें डालता, पैसों का लेन-देन करता और भारी ठेला भी ठेलता। आप कहेंगे इस में क्या नई बात है। विडम्बना यह थी कि उसका दायां हाथ कन्धे से नीचे नहीं था। इस अपंगता के होते हुए भी वह प्रत्यक्ष रूप से अपने सब काम बखूबी से निबटाता हुआ अपने बाल-बच्चों की जिम्मेदारी निभा रहा था। उसके चेहरे पर एक संतुष्टि थी।

मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि कहां यह कम पढ़ा-लिखा गरीब इंसान जो एक अपूर्ण शरीर से ही जीवन की लड़ाई सम्मानपूर्वक लड़े जा रहा है और कहां यह उच्च शिक्षा-प्राप्त, सुविधाओं से सम्पन्न सज्जन जो शारीरिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से पूर्ण-सम्पूर्ण होते हुए भी अपने थोथे अहम के लिए बरसों से अपंगों सा जीवन जी रहा है और अपने परिवार पर भी अनचाहा बोझ बना हुआ था। 

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