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विश्व काव्य

विश्व काव्यः पांव तले कुछ नहीं भूमि का ओर-छोर है

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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टल जाता है कैसा भी अवसाद 
ढीला कर देती है पीड़ा पाश कभी भी अपना 
रुक जाता है गिद्ध अचानाक उड़ते-उड़ते

फूट निकलता है अधीर आलोक
भूतों को भी लगत जाती है प्यास।

चित्र हमारे आ ही जाते बाहर
बरसों तलघर में रहने के बाद। 

हर कोई कौतुक से चारों और निरखता
दल के दल हम खूब टहलते खुली धूप में। 

हममें से हर एक अधखुला दरवाजा है
खुलता उस कमरें में जो हर एक के लिए। 

पांव तले कुछ नहीं भूमि का ओर-छोर है

जल -दिपता है जहां कहीं पेड़ों का झुरमुट

झील एक खिड़की है जो खुलती पृथ्वी में। 

(पुनर्वसु, विश्व कविता से एक चयन से साभार) 
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