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Octavio paz poetry in hindi jane aur thehar jaane ke beech

विश्व काव्य

ओक्तावियो पॉज़ की कविता ‘जाने और ठहर जाने के बीच’

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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अपनी पारदर्शिता पर मोहित दिन 
झिझकता है जाने और ठहरने के बीच 
यह गोलाकार दोपहर अब एक घाटी है
जहाँ नि:शब्दता में दुनिया झूलती है 
सब प्रत्यक्ष है और सब पकड़ से बाहर
सब पास है और छुआ नहीं जा सकता 
काग़ज़, क़िताब, पेंसिल, गिलास 
अपने-अपने नामों की छाँव में बैठे हैं 
मेरी धमनियों में धड़कता समय 
उसी न बदलने वाले रक्तिम शब्दांश 
को दोहराता है 
रोशनी बना देती है उदासीन दीवार को
प्रतिबिम्बों का एक अलौकिक मंच 
मैं स्वयं को एक आँख की पुतली में 
पाता हूँ, उसकी भावशून्य ताक में 
स्वयं को ही देखता हुआ 
वह पल बिखर जाता है, एकदम स्थिर
मैं ठहरता हूँ और जाता हूँ : मैं एक विराम हूँ 


अँग्रेज़ी से अनुवाद : रीनू तलवाड़
साभार- कविताकोश 

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