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Gabirel gadfly poetry on map

विश्व काव्य

गैब्रिएल गैडफ्लाईं: नक्शा देखने से मुझे क्यों नफ़रत है...

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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मैंने अपनी किचन टेबल के ऊपर
फैला रखा है एक नक्शा
और एक ऊँगली वहाँ रखता हूँ
तुम जहाँ हो
और दूसरी वहाँ मैं जहाँ हूँ।

दोनों उँगलियों के बीच का फ़ासला 
महज़ कुछ इंच का, इतना कम
कि मुझे छू सकती हैं तुम्हारी साँसें।
मैं थोड़ा-सा फैलाऊँ
तो अपनी उँगलियाँ फिरा सकता हूँ
तुम्हारे माथे की हर लट में,
जब चाहूँ सहला सकता हूँ तुम्हारे होठ
बगैर यहाँ से हिले-डुले।

नक्शे के एक कोने पर
बना हुआ है दूरी की माप का निशान...
एक इंच होते हैं सौ मील के बराबर
जिनके बीच सड़कें, नदियाँ और दरख़्त पड़ते हैं...
यह निशान बार-बार याद दिलाता है
कि तुम कहाँ हो इस नक्शे पर
और मैं कहाँ हूँ,
हम दोनों के बीच
इंच भर का तो फ़ासला है। 

अनुवाद- यादवेन्द्र पांडेय
साभार- नया ज्ञानोदय
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