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विश्व काव्य

विश्व काव्यः और बस मैं उसे चूम नहीं सका...

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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वह घर आयी गंध लिये पराये पुरुष की 
और बस मैं उसे चूम नहीं सका
तब धूप से अब तक गर्म रजाइयां लेकर 
हम साथ बिस्तर में लेट गये 
उस दिन इतना सुंदर मौसम था 
तब भी मैं उसे चूम नहीं सका 
उसने अपने स्तन मेरे सीने में गड़ा दिये 
तब भी मैं उसे वह नहीं कर सका
मुझे लगा वह कोई और स्त्री है 
जैसे हम कभी नहीं मिले हैं
तब भी बिना उसकी जंघाओं के बीच प्रवेश किए 
उस दिन रविवार-सा लग रहा था
जब मैं अकेला मछलियां पकड़ने जाता था 
और सर्दियों के सुकुमार सूर्य को देखता था 
छोटे- से तालाब के किनारे 
मैं डरा हुआ था -
तब भी मैं वह नहीं कर सका
फिर कुछ देर में मुझे नींद आने लगी 
रात घास के विराट मैदान की तरह थी 
कोई जितना चाहे दौड़ सकता था 
कोई जितना चाहे दौड़ सकता था 

(पुनर्वसु से साभार शुंतारो तानीकावा की कविता चुंबन)
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