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परवीन शाकिर

विश्व काव्य

गए बरस की ईद का दिन क्या अच्छा था: परवीन शाकिर

अमर उजाला, काव्यडेस्क, नई दिल्ली

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गए बरस की ईद का दिन क्या अच्छा था
चाँद को देख के उसका चेहरा देखा था

फ़ज़ा में कीट्स के लहजे की नरमाहट थी
मौसम अपने रंग में फ़ैज़ का मिश्रा था

दुआ के बेआवाज़ उलूही लम्हों में
वो लम्हा भी कितना दिलकश लम्हा था आगे पढ़ें

आँखों ही आँखों में

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