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विश्व काव्य

 क्रिस्टीना रोजेटी:  वह नदी किनारे बैठ गाती थी सदा

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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गुनगुनाती नदी की संगिनी बन 
वह नदी किनारे बैठ गाती थी सदा,
ताकती थी मुस्कराती धूप में 
मछलियों के खेल और अठखेलियाँ ,

मैं बैठती थी हमेशा अपना विलाप लिए,
चाँद की यंत्रणा भरी गोद में,
देखती थी बसन्त की आहटों को,
नदी में बहती हुई सुबकती पत्तियों को, 

मैं यादों के लिए गुज़रती थी आँसुओं के सफ़र से,
वह अपने गीतों में जलाती थी, उम्मीद के दिए,
मेरे आँसू कहीं खो गए समन्दर में जाकर,
और उसके गीतों को ले गयी हवा बहाकर। 

मूल अँग्रेज़ी से अनुवाद : सोनाली मिश्र

 साभार: कविताकोश
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