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टोमस ट्रांसट्रोमर

विश्व काव्य

विश्व काव्यः स्वीडिश कवि टोमस ट्रांसट्रोमर की कविता कांचघर

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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एक काले दिन के बाद बजाता हूं मैं हेडन का संगीत
और महसूस करता हूं थोड़ी गर्मी हथेलियों में। 

उत्सुक हैं परदे पियानो के, गिरती हैं कोमल हथौड़ियां
स्वर है ओजस्वी, स्निग्ध, आपूरित मौन से। 

स्वर में पुकार है स्वतंत्रता की-'मैं हूं'
कोई है जो करदाता नहीं सम्राट का। 

झोंकता हूं हाथ अपने संगीत की जेबों में,
अब मैं हूं पूरी तरह शांत और निरुद्विग्न। 

गीत की ध्वजा है यह ऊपर उठी हुईः पढ़ लो संकेत यहः
''हम नहीं करते हैं आत्म समर्पण। हम चाहते हैं शांति।''

कांच का है घर संगीत, खड़ा ढलान पर
उड़ रही हैं चट्टानें, लुढ़क रही हैं चट्टानें। 

चट्टानें लुढ़कती हुई आर-पार हो जातीं घर के
घर का शीशा मगर अभी तक साबुत है। 

(पुनर्वसुः विश्व कविता से एक चयन से साभार स्वीडिश कवि टोमस ट्रांसट्रोमर की रचना)
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