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डेनिस ब्रूटस

विश्व काव्य

विश्व काव्यः डेनिस ब्रूटस, वक्त आ गया है...

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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वक्त आ गया है कि अब मैं कुछ कहूं
मेरी इस हिसाबी चुप्पी को तोड़ने का 
अब वक्त आ गया है 
मौजूदा मित्रों को जिसकी चोट से मैं बचाये हूं
मैं उनकी वजह से इंतहा शर्मिंदा हूं
जो चाल में हल्की सी जुंबिश ला 
जो उनकी हिचक का हिसाब दे देती 
मेरी बगल से चुपचाप गुजर जाते हैं

मैं तब बहुत स्वस्थ महसूस करता हूं
जब मेरा हृदय गुस्से, चोट या वितृष्णा से 
भर नहीं उठता
जब कोई मेरी पहचान से भी अनजान बन 
चुपके से मेरी बगल से गुजर जाता है 

और वे जो आत्मरक्षा के पता नहीं 
किस घोंसले को सीने से चिपटाये हैं ऐसे 
कि पारम्परिक बधाई का एक शब्द भी 
लिख नहीं पाते 

मेरी ओर वे अपना केवल वही पक्ष करते हैं 
जो विस्मृति की सीमा तक ठंडा हो चुका है

यदि कुछ लोग कानून के कठोर नियम से 
विधान की अनिश्चितता की वजह से 

- डेनिस ब्रूटस 
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