कड़ाके की ठंड पर कुछ दोहे.... 

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                            कुहरे की आकाश से , शाम हुई क्या बात।
                                                                     
                            
सुबह-सुबह ही लूट ली, सूरज की बारात।।

ठिठुर-ठिठुर कर ठंड से, होती है बेहाल।
कौन लूट कर ले गया 'पश्मीना' की शाल ।। 

पाँचों भाई-बहिन औ,  पिल्ले-पिलिया चार।
सर्दी  में लिपटे सहें ,कंगाली की  मार।।

कुहरे, सरदी, धुंध के ,ऐसे-ऐसे  दंड। 
भिगो-भिगो कर हवा में , हाड़ तोड़ती ठंड।   

आग सेंकने ज्यों गया, सूरज थानेदार।
कुहरे ने लूटा तभी, किरणों का बाज़ार।।

ठिठुर- ठिठुर कर ठंड से , रात पड़ी  बेहाल।
भोर चिढ़ाने आ गई,   ओढ़ सुनहली शाल।।

देख हाँकते चाँद को, तारों वाले ढोर।
सरदी में शैतान -सी ,मिली चिढ़ाती भोर।।  आगे पढ़ें

4 months ago

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