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वायरल कविता

वायरल

चेहरों को नहीं दिल को भी पढ़ने का वक्त हो ...

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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मन की थकन जो उतार दे
वो 'अवकाश' चाहिए।
इस भागती-सी जिंदगी में
'फुरसत' की सांस चाहिए।
चेहरों को नहीं दिल को भी
पढ़ने का वक्त हो ...
मोबाइल लैपटॉप से
कुछ पल
'संन्यास' चाहिए।
मन की जमीं के सूखे पर तो
ध्यान ही नहीं।
कब बन गए 'ऊसर'
हमें ये भान ही नहीं।
कोई फूल इस पर
खिलने को 'प्रयास' चाहिए।
अपनों की देखभाल का
'एहसास' चाहिए।
अब बहुत मन भर
गया बड़प्पन और मान से।
है बहुत तृप्त अहम
झूठी आन बान शान से।
इसको भी एक दिन का 'उपवास' चाहिए।
बन जाऊं तितली या परिंदा कोई
वो 'आभास' चाहिए।
मन की थकन जो उतार दे
वो 'अवकाश' चाहिए।

(ये शायरी सोशल मीडिया में लोकप्रिय है। अगर आपको इनके लेखक का नाम मालूम हो तो साझा करें। शायरी के साथ शायर का नाम लिखने में हमें ख़ुशी होगी।)
 
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