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बोलना किसी पत्र का खुलना नहीं होता अक्सर, वो किसी किताब का बंद होना भी होता है...

वायरल

बोलना किसी पत्र का खुलना नहीं होता अक्सर, वो किसी किताब का बंद होना भी होता है...

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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मैं एक दिन बोलूँगा !!

मुझे एक शब्द बोलना होता है
तो आठ बार सोचता हूँ
उसमें से एक सोच ये भी होती है
कि क्या मौन बोला जा सकता है ?
मैं बोलना चाहता हूँ
जैसे बोली थी बिछड़ते हुए तुम्हारी आँखें
जैसे अक्सर मेरी माँ की ख़ामोशी बोलती है
जैसे पिता का अबोला बोलता है
जैसे भाई का पसीना बोलता
पर अक्सर बोल पड़ता हूँ
जैसे मरने से पहले बकरा बोलता है
जैसे रात के सन्नाटे में झींगुर बोलता है
जैसे बहुत दिन से बंद कोई किवाड़ खुलने पर बोलता है आगे पढ़ें

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