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सुबह की भोली सी किरणें

rajesh kumar

3 कविताएं

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सुबह की भोली सी किरणें
मानों आई धरती से मिलने
स्वर्ण सी चमक लिए
कलियां लगी खिलने
भौर हुई पक्षी चहके
खुशियों से तनबदन महके
फुल मुस्कुराकर लगे खिलने
चारों ओर हरियाली छाई है
पवन ने मस्ती बढ़ाई है
जैसे-जैसे दिन चढ़े हैं
वैसे-वैसे मानव बढ़े है
अब मशीनी काम है
मानव चाहकर भी गुलाम है
नकली फुलों के गुलदस्ते
कहां से खुशबू देेंगे
काम किए बगैर फल कहां से मिलेंगे
पाने को कुछ करना पड़ता है
यही है जग की रीत
सच्चाई पे कोई मरता है
कोई झूठ के बल तैरता है
यहां जग की प्रीत निराली
मानव खुद मिटाता हरियाली
खुद के पांवों पर चलाता कुल्हाड़ी
खुद को समझे ‘राजेश’ खिलाड़ी
फिर से महके अपनी बारी आओ मिलकर पेड़ लगाएं
अपना प्यारा पर्यावरण बचाएं

-- राजेश बैनिवाल खचवाना

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