आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

Social Media Poetry: घर में भी है कौन ठिकाना, आते ही फिर बाहर जाना

सोशल मीडिया
                
                                                                                 
                            घर में भी है कौन ठिकाना ?
                                                                                                

आते ही फिर बाहर जाना,
जाने क्यों बेघर-सा जीवन 
कभी-कभी अच्छा लगता है ?
खोई खोई-सी आँखें और
डगमग डगमग पाँव। 

पता नहीं है धूप कि ऊपर
वट-पीपल की छाँव,
चलते जाना सीधे और फिर 
एकदम मुड़ जाना,
रुक कर कहीं बैठ जाना फिर 
मिले जहाँ भी ठाँव ।।

ओढ़े हुए उदासी प्रतिक्षण
बने हुए बेचैन अकारण 
किरच किरच-सा टूटा दर्पण
तकना भी अच्छा लगता है।।
  आगे पढ़ें

1 month ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X