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Hindi kavita jab vikrat hain insani iraade

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कैसे आगे बढ़े बेटी, जब विकृत हैं इंसानी इरादे

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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फिर वही शोकसभा, श्रद्धांजलि अपार है
संसद से सड़क तक बयानों का ज्वार है।

रोएंगी मोमबत्तियां, आंखों में होंगी चिंगारियां
एक-दो दस दिन फिर चुप्पी, यही तो रिवाज है।

सड़कों पर तनेंगीं मुट्ठियां, संताप बेशुमार है
महज़ तख्तियां बोलेंगी, चेहरे देखो बेहिसाब हैं।

फिर सियासत चमकेगी, मूल्यों की बातें होंगी
दो मिनट मौन, कुछ फूल, फिर आरोप बेशुमार है।

सत्ता-विपक्ष भिड़ेंगे, दरिंदों को सजा की बातें होंगी
दिन गुजरेंगे, बात ख़तम, कुर्सी के किस्से अपार हैं।

धृतराष्ट्र को क्या दोष दें, दुर्योधन अब हजार हैं
रावण को फूंक-फूंककर, हम मुग्ध अपार हैं।

सीता, राधा, दुर्गा की गाते महिमा अपरंपार हैं
बात हिफ़ाज़त की हो तो सारे गाने बेकार हैं।

राखी को कलाई पर बांध, कसमें खाते हज़ार हैं
फिर कितने ही हाथ दुःशासन के कुनबे में शुमार हैं।

शर्म है, धिक्कार है, चेतना भी कितनी बेज़ार है
कब तक सहेंगी बेटियां, इंसानियत की दुहाई बेकार है।

बंद करो नारे, मिटा दो, थोथे हैं ये सारे वादे
कैसे आगे बढ़े बेटी, जब विकृत हैं इंसानी इरादे।

- विनोद पुरोहित

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