रितेश रजवाड़ा की ख़ूबसूरत नज़्म 'वो गुलमोहर सी लड़की'

ritesh rajwada nazm wo gulmohar si ladki
                
                                                             
                            

वो गुलमोहर सी लड़की
उसकी गुदाज़ बाहें
वो धूप धूप सांसे
वो नर्म नर्म आहें
खुशरंग तितलियों सी

वो गुलमोहर सी लड़की

इक धुंध सी हक़ीक़त
कुछ वक़्त सी रवानी
सोचो तो जैसे खुशबू
पकड़ो तो जैसे पानी,

इक दीप सा जले है
वो जब भी मुस्कुराए
वो हाथ भी बढ़ा दे
तो चांद तोड़ लाए
हर शय पे उसका काबू
हर चीज़ उसके मन की

वो गुलमोहर सी लडक़ी

हाय.. जिस्म की बनावट
किस चाक पे बनी है?
किस रंग ने रंगा है?
किस घाट पे सनी है?
जी चाहता है उसपे
कुछ नज़्म सा लिखूं मैं
जी भर के उसको रंगू
फिर रंग चूम लूं मै
उफ्फ नाज़ुकी अलहदा
पत्ते पे ओस जैसी

वो गुलमोहर सी लड़की

वो रुनझुनें सुनी हैं!
बछड़े के घुंघरुओं की!
दुल्हन के करधनों की!
गेंहूं के बालियों की!

हंसती है खिलखिला के
जैसे कि बूंद बरसे
जैसे के जंगलों से
नदिया कोई उतर के
बेलौस नाचती है
खेतों को सींचती है
हर ओर दौड़ती
अलमस्त बावरी सी

वो गुल मोहर सी लड़की

3 weeks ago

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