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किस की ख़्वाहिश में जल रहा है बदन मोम जैसा पिघल रहा है बदन: क़मर साक़ी

उर्दू अदब
                
                                                                                 
                            किस की ख़्वाहिश में जल रहा है बदन 
                                                                                                

मोम जैसा पिघल रहा है बदन 

धीरे धीरे बदल रहे हैं ख़याल 
रफ़्ता रफ़्ता बदल रहा है बदन 

दुख के काँटों पे सो रहा हूँ मैं 
ग़म के शो'लों पे जल रहा है बदन 

हुस्न-ए-पुर-नूर से लिपटने को 
पागलों सा मचल रहा है बदन  आगे पढ़ें

1 month ago

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