तुझ से बिछड़ कर क्या हूं मैं, अब बाहर आ कर देख - मुनीर नियाज़ी

muneer niyazi ghazal tujh se bichhad kar kya hoon main
                
                                                             
                            तुझ से बिछड़ कर क्या हूं मैं, अब बाहर आ कर देख
                                                                     
                            
हिम्मत है तो मेरी हालत आंख मिला कर देख

शाम है गहरी, तेज़ हवा है, सर पे खड़ी है रात
रस्ता गये मुसाफ़िर का अब दिया जला कर देख

दरवाज़े के पास आ आ कर वापस मुड़ती चाप
कौन है इस सुनसान गली में, पास बुला कर देख

शायद कोई देखने वाला हो जाये हैरान
कमरे की दीवारों पर कोई नक़्श बना कर देख

तू भी मुनीर अब भरे जहां में मिल कर रहना सीख
बाहर से तो देख लिया अब अंदर जा कर देख 
1 month ago

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