'ख़बरों' पर कहे शायरों के अल्फ़ाज़

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कुछ ख़बर होती तो मैं अपनी ख़बर क्यूं रखता
ये भी इक बे-ख़बरी थी कि ख़बर-दार रहा
- अनवर देहलवी


जो दिल को है ख़बर कहीं मिलती नहीं ख़बर
हर सुब्ह इक अज़ाब है अख़बार देखना
- उबैदुल्लाह अलीम

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1 month ago

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