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Jaun Eliya ghazal: तेरे साथ तिरी याद आई क्या तू सच-मुच आई है

आज का शब्द
                
                                                                                 
                            तू भी चुप है मैं भी चुप हूँ ये कैसी तन्हाई है 
                                                                                                

तेरे साथ तिरी याद आई क्या तू सच-मुच आई है 

शायद वो दिन पहला दिन था पलकें बोझल होने का 
मुझ को देखते ही जब उस की अंगड़ाई शर्माई है 

उस दिन पहली बार हुआ था मुझ को रिफ़ाक़त का एहसास 
जब उस के मल्बूस की ख़ुश्बू घर पहुँचाने आई है 

हुस्न से अर्ज़-ए-शौक़ न करना हुस्न को ज़क पहुँचाना है 
हम ने अर्ज़-ए-शौक़ न कर के हुस्न को ज़क पहुँचाई है 

हम को और तो कुछ नहीं सूझा अलबत्ता उस के दिल में 
सोज़-ए-रक़ाबत पैदा कर के उस की नींद उड़ाई है 

हम दोनों मिल कर भी दिलों की तन्हाई में भटकेंगे 
पागल कुछ तो सोच ये तू ने कैसी शक्ल बनाई है  आगे पढ़ें

1 month ago

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