इक़बाल अज़ीम की ग़ज़ल: हम बहुत दूर निकल आए हैं चलते चलते 

उर्दू अदब
                
                                                             
                            हम बहुत दूर निकल आए हैं चलते चलते 
                                                                     
                            
अब ठहर जाएँ कहीं शाम के ढलते ढलते 

अब ग़म-ए-ज़ीस्त से घबरा के कहाँ जाएँगे 
उम्र गुज़री है इसी आग में जलते जलते 

रात के बा'द सहर होगी मगर किस के लिए 
हम ही शायद न रहें रात के ढलते ढलते 

रौशनी कम थी मगर इतना अँधेरा तो न था 
शम-ए-उम्मीद भी गुल हो गई जलते जलते  आगे पढ़ें

1 month ago

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