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हम्माद नियाज़ी: दिल के सूने सहन में गूँजी आहट किस के पाँव की

उर्दू अदब
                
                                                                                 
                            दिल के सूने सहन में गूँजी आहट किस के पाँव की 
                                                                                                

धूप-भरे सन्नाटे में आवाज़ सुनी है छाँव की 

इक मंज़र में सारे मंज़र पस-मंज़र हो जाने हैं 
इक दरिया में मिल जानी हैं लहरें सब दरियाओं की 

दश्त-नवर्दी और हिजरत से अपना गहरा रिश्ता है 
अपनी मिट्टी में शामिल है मिट्टी कुछ सहराओं की 

बारिश की बूँदों से बन में तन में एक बहार आई 
घर घर गाए गीत गगन ने गूँजीं गलियाँ गाँव की 

सुब्ह सवेरे नंगे पाँव घास पे चलना ऐसा है 
जैसे बाप का पहला बोसा क़ुर्बत जैसे माओं की  आगे पढ़ें

1 month ago

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