हमीदा शाहीन: कौन बदन से आगे देखे औरत को 

उर्दू अदब
                
                                                             
                            इक जादूगर है आँखों की बस्ती में 
                                                                     
                            
तारे टाँक रहा है मेरी चुनरी में 

मेरे सख़ी ने ख़ाली हाथ न लौटाया 
ढेरों दुख बाँधे हैं मेरी गठड़ी में 

कौन बदन से आगे देखे औरत को 
सब की आँखें गिरवी हैं इस नगरी में 

जिन की ख़ुशबू छेद रही है आँचल को 
कैसे फूल वो डाल गया है झोली में 

जिस ने मेहर-ओ-माह के खाते लिखने हों 
मैं इक ज़र्रा कब तक उस की गिनती में  आगे पढ़ें

1 month ago

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