हफ़ीज़ जालंधरी: दिल से तिरा ख़याल न जाए तो क्या करूँ 

हफ़ीज़ जालंधरी
                
                                                             
                            दिल से तिरा ख़याल न जाए तो क्या करूँ 
                                                                     
                            
मैं क्या करूँ कोई न बताए तो क्या करूँ 

उम्मीद-ए-दिल-नशीं सही दुनिया हसीं सही 
तेरे बग़ैर कुछ भी न भाए तो क्या करूँ 

दिल को ख़ुदा की याद तले भी दबा चुका 
कम-बख़्त फिर भी चैन न पाए तो क्या करूँ 

दिन हो कि रात एक मुलाक़ात की है बात 
इतनी सी बात भी न बन आए तो क्या करूँ 

जो कुछ बना दिया है तिरे इंतिज़ार ने! 
अब सोचता हूँ तू इधर आए तो क्या करूँ  आगे पढ़ें

1 month ago

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