गुलज़ार: हर एक ग़म निचोड़ के हर इक बरस जिए 

गुलज़ार
                
                                                             
                            हर एक ग़म निचोड़ के हर इक बरस जिए 
                                                                     
                            
दो दिन की ज़िंदगी में हज़ारों बरस जिए 

सदियों पे इख़्तियार नहीं था हमारा दोस्त 
दो चार लम्हे बस में थे दो चार बस जिए 

सहरा के उस तरफ़ से गए सारे कारवाँ 
सुन सुन के हम तो सिर्फ़ सदा-ए-जरस जिए 
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6 months ago

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😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
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