गुलज़ार: कुछ ऐसे कारवाँ देखे हैं सैंतालिस में भी मैंने

Gulzar Best Poetry Kuch Ese Karwan  Dekhe hain setalish me bhi maine
                
                                                             
                            

कुछ ऐसे कारवां देखे हैं सैंतालिस में भी मैंने
ये गांव भाग रहे हैं अपने वतन में
हम अपने गांव से भागे थे, जब निकले थे वतन को
हमें शरणार्थी कह के वतन ने रख लिया था
शरण दी थी
इन्हें इनकी रियासत की हदों पे रोक देते हैं
शरण देने में ख़तरा है
हमारे आगे-पीछे, तब भी एक क़ातिल अजल थी
वो मजहब पूछती थी
हमारे आगे-पीछे, अब भी एक क़ातिल अजल है
ना मजहब, नाम, जात, कुछ पूछती है
- मार देती है

ख़ुदा जाने, ये बंटवारा बड़ा है
या वो बंटवारा बड़ा था

5 months ago

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