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फ़रह इक़बाल: ज़रा सी रात ढल जाए तो शायद नींद आ जाए

उर्दू अदब
                
                                                                                 
                            ज़रा सी रात ढल जाए तो शायद नींद आ जाए 
                                                                                                

ज़रा सा दिल बहल जाए तो शायद नींद आ जाए 

अभी तो कर्ब है बे-चैनियाँ हैं बे-क़रारी है 
तबीअ'त कुछ सँभल जाए तो शायद नींद आ जाए 

हवा के नर्म झोंकों ने जगाया तेरी यादों को 
हवा का रुख़ बदल जाए तो शायद नींद आ जाए 
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2 months ago

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😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
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