फ़ैज़ अहमद फ़ैज़: बात बस से निकल चली है, दिल की हालत सँभल चली है

faiz ahmed faiz ghazal baat bas se nikal chali hai
                
                                                             
                            

बात बस से निकल चली है
दिल की हालत सँभल चली है

अब जुनूँ हद से बढ़ चला है
अब तबीअ'त बहल चली है

अश्क ख़ूनाब हो चले हैं
ग़म की रंगत बदल चली है

या यूँही बुझ रही हैं शमएँ
या शब-ए-हिज्र टल चली है

लाख पैग़ाम हो गए हैं
जब सबा एक पल चली है

जाओ अब सो रहो सितारो
दर्द की रात ढल चली है

5 months ago

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