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'बाकर' मेंहदी की ग़ज़ल- चाहा बहुत के इश्क़ की फिर इब्तिदा न हो

प्रतीकात्मक तस्वीर
                
                                                                                 
                            चाहा बहुत के इश्क़ की फिर इब्तिदा न हो
                                                                                                

रूसवाइयों की अपनी कहीं इंतिहा न हो

जोश-ए-वफ़ा का नाम जुनूँ रख दिया गया
ऐ दर्द आज ज़ब्त-ए-फु़गाँ से सिवा न हो
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1 month ago

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