साफ़ कहते हो मगर कुछ नहीं खुलता कहना - अमीर मीनाई

ameer minai ghazal saf kahte ho magar kuch nahin khulta kahna
                
                                                             
                            

साफ़ कहते हो मगर कुछ नहीं खुलता कहना
बात कहना भी तुम्हारा है मुअम्मा कहना

रो के उस शोख़ से क़ासिद मिरा रोना कहना
हँस पड़े उस पे तो फिर हर्फ़-ए-तमन्ना कहना

और थोड़ी सी शब-ए-वस्ल बढ़ा दे या-रब
सुब्ह नज़दीक हमें उन से है क्या क्या कहना

फाड़ खाता है जो ग़ैरों को झपट कर सग-ए-यार
मैं ये कहता हूँ मिरे शेर तिरा क्या कहना

वस्फ़-ए-रुख़ में जो सुने शेर वो हँस कर बोले
शेर हैं नूर के है नूर का तेरा कहना

कर लिया अहद कभी कुछ न कहेंगे मुँह से
अब अगर सच भी कहें तुम हमें झूटा कहना

ख़ाक में ज़िद से मिलाओ न मिरे आँसू को
सच्चे मोती को मुनासिब नहीं झूटा कहना

कैसे नादाँ हैं जो अच्छों को बुरा कहते हैं
हो बुरा भी तो उसे चाहिए अच्छा कहना

2 months ago

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