तुम आए हो तुम्हें भी आज़मा कर देख लेता हूँ: अहमद मुश्ताक़

तुम आए हो तुम्हें भी आज़मा कर देख लेता हूँ: अहमद मुश्ताक़
                
                                                             
                            तुम आए हो तुम्हें भी आज़मा कर देख लेता हूँ 
                                                                     
                            
तुम्हारे साथ भी कुछ दूर जा कर देख लेता हूँ 

हवाएँ जिन की अंधी खिड़कियों पर सर पटकती हैं 
मैं उन कमरों में फिर शमएँ जला कर देख लेता हूँ 

अजब क्या इस क़रीने से कोई सूरत निकल आए 
तिरी बातों को ख़्वाबों से मिला कर देख लेता हूँ 

सहर-ए-दम किर्चियाँ टूटे हुए ख़्वाबों की मिलती हैं 
तो बिस्तर झाड़ कर चादर हटा कर देख लेता हूँ  आगे पढ़ें

1 month ago

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