अब्दुल हमीद अदम की ग़ज़ल: जब तिरे नैन मुस्कुराते हैं

उर्दू अदब
                
                                                             
                            जब तिरे नैन मुस्कुराते हैं 
                                                                     
                            
ज़ीस्त के रंज भूल जाते हैं 

क्यूँ शिकन डालते हो माथे पर 
भूल कर आ गए हैं जाते हैं 

कश्तियाँ यूँ भी डूब जाती हैं 
नाख़ुदा किस लिए डराते हैं 

इक हसीं आँख के इशारे पर 
क़ाफ़िले राह भूल जाते हैं 
1 month ago

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