आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Kavya Charcha ›   Shahryar favorite shayar of Gulzar
Shahryar favorite shayar of Gulzar

काव्य चर्चा

शहरयार: लहू-लुहान सभी कर रहे हैं सूरज को, किसी को ख़ौफ़ यहां रात का नहीं क्या?

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

2601 Views
'सीने में जलन आंखों में तूफ़ान-सा क्यों है
इस शहर में हर शख़्स परेशान-सा क्यों  है'


शायर और गीतकार शहरयार की ये ग़ज़ल 1978 में रिलीज़ हुई फ़िल्म 'गमन' में इस्तेमाल हुई थी। उनकी शायरी का अंदाज़ अन्य शायरों से बिल्कुल जुदा था। वो किसी को कॉपी नहीं करते बल्कि अपनी राह और अपनी मंज़िल ख़ुद ही तय करते हैं। चाहे नज़्म कहना हो या ग़ज़ल। शहरयार उन शायरों में से हैं जो गुलज़ार को बेहद पसंद हैं। 

भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित 'शहरयार सुनो' किताब की भूमिका में गुलज़ार लिखते हैं, "बड़ी शायरी के बड़े शायर फ़िराक़ थे, फ़ैज़ थे, फ़राज़ थे और शहरयार हैं। शहरयार के यहां कोई हेड-लाइन नज़र नहीं आती। वे कोई नारा नहीं लगाते। फ़ैज़ अपनी बात को परचम की तरह तान देते हैं। फ़िराक़ अपनी बात का ऐलान करते थे। फ़राज़ भी। उनकी बात बड़ी वाज़ेह (स्पष्ट) होती थी और सुर्ख़ी बन जाती थी। शहरयार इन सबसे 'सटल' शायर हैं। जिस तरह पढ़ते हैं, वैसा ही लिखते हैं और जैसा लिखते हैं वैसा ही पड़ते हैं। 

पूरे सब्र और तहम्मुल (सहनशीलता) से बात करते हैं। उनका कहा, कंवल के पत्ते पर गिरी बूंद की तरह देर तक थिरकता रहता है। शेर सुन कर देर तक कान में गूंजता है। वो घटा की तरह उमड़ कर नहीं आते। बेश्तर (ज़्दायतर) शायरों की तरह। उठाकर खिड़कियां बंद नहीं करनी पड़तीं कि अंदर के दरी, ग़लीचे भीग जाएंगे। बल्कि उठ कर खिड़की खोलें तो पता चलता है कि बाहर बारिश हो रही है। इंक़लाब की आवाज़ फ़ैज़ के यहां भी सुनाई देती हैं। फ़राज़ के यहां भी। लेकिन यूं ख़ुद-कलामी के अंदाज़ में सिर्फ़ शहरयार के यहां सुनाई देती है। आगाही है, लेकिन यूं जैसे कन्धे पर  हाथ रख कर कोई समझा रहा है : 

'उधर देखो हवा के बाज़ुओं में 
एक आहट क़ैद है...
... अगर तुम चाहते हो
इस ज़मीं प हुक्मरानी हो तुम्हारी
तो मेरी बात मानो
हवा के बाज़ुओं में क़ैद इस आहट को
अब आज़ाद कर दो !!'


'फ़ैसले की घड़ी' एक और ऐसी नज़्म है :

'बारिशें फिर ज़मीनों से नाराज़ हैं
और समन्दर सभी ख़ुश्क हैं
खुरदरी, सख़्त, बंजर ज़मीनों में क्या
बोइये और क्या काटिये!
आंख की ओस के चन्द क़तरों से क्या
इन ज़मीनों को सैराब कर पाओगे?'


गुलज़ार ख़ुद को शहरायार का एक प्रशंसक मानते हैं। वो लिखते हैं, मैं नक़्क़ाद (आलोचक) नहीं, न ही माहिरे-फ़न या ज़ुबान और ग्रामर का माहिर- मैं महज़ एक शहरयार का मद्दाह (प्रशंसक) और उनकी शायरी को महससू करने वाला शायर हूं। शहरयार उमूमन (अक्सर) ग़ज़ल ही सुनाते हैं। किसी महफ़िल में हों या मुशायरे में। मगर मुझे उनका लहजा हमेशा नज़्म का लगता है। बात सिर्फ़ उतनी नहीं होती। जितनी वो एक शेर बन्द कर देते हैं। थोड़ी देर वहीं रुको, तो हर शेर के पीछे एक नज़्म खुलने लगती है :

'तुम्हारे शहर में, कुछ भी हुआ नहीं है क्या?
कि तुमने चीख़ों को, सचमुच सुना नहीं क्या?'

इस शेर के पीछे की नज़्म खोलों तो एक और शेर सुनाई देता है :

'तमाम ख़ल्के ख़ुदा उस जगह रुकी क्यों है?
यहां से आगे कोई रास्ता नहीं है क्या?


रुकिये फिर चलिये...

लहू-लुहान सभी कर रहे हैं सूरज को
किसी को ख़ौफ़ यहां रात का नहीं क्या?'


तमाम शेर फिर से पढ़ जाइये और बताइये ये नज़्म है क्या? शहरयार अपनी ग़ज़लों के लिए जाने जाते हैं। मेरा ख़्याल है शायद इसलिए कि उनकी ग़ज़ल का शेर सिर्फ़ एक उद्धरण बन कर रुक नहीं जाता। चलता रहता है। एक तसलसुल (निरंतरता) है। बयान में इख़त्सार और लहजे की नर्मी उनका ख़ास अंदाज़ है। सारा कलाम पढ़ जाओ, कहीं ग़ुस्से की ऊंची आवाज़ सुनाई नहीं देती। ज़ख़्म हैं, दर्द हैं, लेकिन चीख़ते नहीं :

'सन्नाटों से भरी बोतलें बेचने वाले 
मेरी खिड़की के नीचे फिर खड़े हुए हैं
और आवाज़ें लगा रहे हैं
बिस्तर की शिकनों से निकलूं
नीचे जाऊं
उनसे पूछूं
मेरी रुस्वाई से उनको क्या मिलता है?'


पूरी नज़्म एक जुमले की तरह बहती है और इसका दूसरा जुमला :

'मेरे पास कोई भी कहने वाली बात नहीं है
सुनने की ताक़त भी कब की गंवा चुका हूं'


नज़्म हो या ग़ज़ल हो, गुफ़्तुगू का अंदाज़ सरासर उनका अपना है। बंदिशें इतनी आसान हैं कि कोशिश करो तो लिखना मुश्किल है। बात कहने में कोई 'प्रयास' नज़र नहीं आता। लगता है सोच रहे हैं। लगता है लाउड थिंकिंग कर रहे हैं: 

'तुमसे मिलने की, तुझको पाने की 
कोई तदबीर, सूझती ही नहीं
एक मंज़िल पे रुक गयी है हयात
ये ज़मीं जैसे घूमती ही नहीं
अजीब चीज़ है ये, वक़्त जिसकों कहते हैं
कि आने पाता नहीं और बीता जाता है !'


शहरयार शराब पीने के काफ़ी शौक़ीन थे। गुलज़ार लिखते हैं कि शराब पीने से, न आदमी छोटा होता है, न शायर ! ग़ालिब नहीं हुए तो शहरयार क्यों होंगे? शराब इतने ही शौक़ से पी। लेकिन शराब का इससे ख़ूबसूरत सफ़र मैंने पहले कभी नहीं पढ़ा : 

'अभी बोतलों के बदन में थी
अभी इक गिलास की तह में थी
अभी क़तरा-क़तरा लरज़ रही थी
लबों की ज़र्द, मुंडेर पर
अभी हलक़ में, अभी दिल में थी
अभी, हां अभी-अभी, बस अभी
किसी रेगज़ार
* में खो गयी'

*रेगिस्तान
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!